बिहार: राज्यसभा की पांचवीं सीट पर जीत का समीकरण सरल नहीं है …………..

अगर अप्रैल 2026 में बिहार की 5 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होता है तो पांचवीं सीट पर जीत का समीकरण बहुत उलझा हुआ है। संख्या बल के हिसाब से भाजपा और जदयू 2-2 सीटें आसानी से जीत सकते हैं। पांचवीं सीट के लिए एनडीए और महागठबंधन, दोनों के पास मौका है। अब सवाल है कि […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
रविवार, 28 दिसंबर 2025, 09:29 AM 6 मिनट read
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बिहार: राज्यसभा की पांचवीं सीट पर जीत का समीकरण सरल नहीं है …………..
Photo: UB India News Archive

अगर अप्रैल 2026 में बिहार की 5 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होता है तो पांचवीं सीट पर जीत का समीकरण बहुत उलझा हुआ है। संख्या बल के हिसाब से भाजपा और जदयू 2-2 सीटें आसानी से जीत सकते हैं। पांचवीं सीट के लिए एनडीए और महागठबंधन, दोनों के पास मौका है। अब सवाल है कि एनडीए क्या पांचवी सीट के लिए दांव खेलेगा ? एनडीए में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी , दोनों एक सीट लेने के लिए अड़े हुए हैं। जीतन राम मांझी बगावती मुद्रा में हैं। उन्होंने ऐलान कर रखा है कि अगर राज्यसभा की एक सीट नहीं मिली तो वे एनडीए छोड़ देंगे। क्या मांझी पांचवीं सीट लेने के लिए तैयार होंगे, या फिर वे सुनिश्चित जीत वाली भाजपा कोटे की एक मांगेंगे? पहले एक नजर डालते है चुनाव में जीत के गणित पर।

एनडीए को 4 और विधायक चाहिए तभी 5 सीट

9 अप्रैल 2026 को बिहार से राज्यसभा की 5 सीटें खाली हो रही हैं। बिहार विधानसभा में एनडीए के 202 सदस्य हैं। राज्यसभा की एक सीट के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। इस लिहाज से पांचों सीट पर जीत के लिए 206 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। यानी एनडीए को सभी पांचों सीट पर जीत के लिए 4 और विधायकों की जरूरत होगी। यह क्रॉस वोटिंग से ही संभव है। इसके लिए कांग्रेस (6) में सेंध लगानी होगी जो आसान नहीं है। बसपा के एक विधायक हैं। अगर AIMIM के 5 विधायक वोटिंग में हिस्सा नहीं ले तो राज्यसभा की एक सीट के लिए आवश्यक विधायकों की संख्या 39 हो जाएगी। ऐसी स्थिति में एनडीए पांचों सीट जीत सकता है।

AIMIM समर्थन दे तभी महागठबंधन को एक सीट

क्या महागठबंधन पांचवीं सीट के लिए कोशिश करे तो क्या वह जीत सकता है? इस सवाल का जवाब भी समझना जरूरी है। महागठबंधन के विधायकों की संख्या केवल 35 है। राजद के 25, कांग्रेस के 6, भाकपा माले के 2, सीपीएम के 1 और आईआईपी के 1 विधायक हैं। AIMIM ने एनडीए और महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ कर 5 सीटें जीती हैं। इसके बाद भी अगर वह समर्थन दे दे तो महागठबंधन 41 के आंकड़े के साथ एक राज्यसभा सीट जीत सकता है। लेकिन चुनाव के समय असदुद्दीन ओवैसी की जिस तरह से तेजस्वी यादव से तकरार हुई थी, उसको देखते हुए यह समर्थन मुश्किल लगता है।

चिराग 2020 का बकाया मांग रहे

जीतन राम मांझी की पार्टी (हम) के 5 विधायक हैं। जबकि लोजपा (आर) के 19 विधायक हैं। संंख्या बल के हिसाब से भी चिराग पासवान का दावा ज्यादा मजबूत है। 2019 में बिहार के राज्यसभा सांसद रविशंकर प्रसाद जब पटना साहिब से लोकसभा सदस्य चुन लिये गये तो उनकी राज्यसभा सीट खाली हो गयी। इस खाली सीट पर भाजपा ने रामविलास पासवान को राज्यसभा भेजा था। जब अक्टूबर 2020 में रामविलास पासवान का निधन हो गया तो भाजपा ने यह सीट लोजपा से वापस ले ली। तब रामविलास पासवान की रिक्त हुई सीट पर भाजपा ने बिहार के नेता सुशील कुमार मोदी को राज्यसभा में भेजा था। अब चिराग मजबूत हो गये हैं इसलिए 2020 वाली सीट की भरपाई चाहते हैं। माना जा रहा है कि 2025 में वो अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजना चाहते हैं।

जीतन राम मांझी को राज्यसभा सीट नहीं मिलने की संभावना

लोकतंत्र में संख्या बल ही निर्णायक है। बातों और दावों की कोई अहमियत नहीं। अगर जीतन राम मांझी को राज्यसभा की एक सीट नहीं मिली तो क्या वे एनडीए छोड़ देंगे ? क्या उनकी धमकी में सच में कुछ दम है ? अगर किसी तरह उन्हें पांचवीं सीट मिल भी जाती है तो क्या वे जीत की बिसात बिछा सकते हैं? इसके लिए उन्हें कई तरह के ‘जुगाड़’ करने पड़ेंगे। जो फिलहाल उनसे संभव नहीं लगता। यह भाजपा या जदयू जैसी बड़ी पार्टी से ही मुमकिन हो सकता है। यानी सामान्य स्थितियों में जीतन राम मांझी को राज्यसभा की एक सीट मिलती हुई नहीं दिख रही है।

विधानसभा चुनाव में धमकी दी फिर शांत हो गये

2025 के विधानसभा चुनाव में जीतन राम मांझी ने कहा था, अगर 15-20 सीटें नहीं मिलीं तो उनकी पार्टी (हम) 100 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। यह एक तरह से बगावती सुर ही था। फिर पलट गये। अब कहा अगर 15 सीटें नहीं मिली तो ‘हम’ चुनाव ही नहीं लड़ेगी। ये सारी धमकियां पानी के बुलबुले की तरह फूट गयीं। चुनाव में 6 सीटें मिलीं। वे राजी-खुशी लड़े और 5 पर जीते। वे केवल इसलिए धमकी देते हैं कि शायद कुछ ज्यादा मिल जाए। उनका मकसद सिर्फ हवा बन कर कुछ फायदा उठाना रहता है। एनडीए कभी छोड़ने वाले नहीं हैं। एनडीए छोड़ कर वे अपनी दुर्गति देख चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे महागठबंधन का हिस्सा थे। राजद ने उन्हें 3 सीटें दी थीं। तीनों सीट हार गये। यहां तक कि वे खुद चुनाव हार गये। गया सीट पर जदयू के विजय मांझी ने जीतन राम मांझी को डेढ़ लाख मतों के विशाल अंतर से हराया था। आज वे एनडीए में हैं तो गया से सांसद हैं और केन्द्रीय मंत्री भी हैं।

क्या मांझी और उनके पुत्र मंत्री पद छोड़ देंगे?

अगर राज्यसभा की एक सीट के लिए जीतन राम मांझी एनडीए से अलग होते हैं तो तत्काल उन्हें दो बड़े झटके लगेंगे। उन्हें खुद केन्द्र में मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा और बिहार में उनके पुत्र संतोष सुमन को भी नीतीश सरकार में मंत्री पद से हटना होगा। उन्होंने कहा है, अगर बड़े लक्ष्य के लिए मंत्री पद छोड़ना पड़े तो इससे पीछे नहीं हटना चाहिए। अगर ऐसा ही है तो 2014 में जब मुख्यमंत्री पद से हटे थे तो खुद को सबसे बड़े दलित नेता के रूप में क्यों नहीं स्थापित कर पाए? यहां तक कि वे 2015 में खुद ही मखदुमपुर विधानसभा सीट पर चुनाव हार गये थे। कोई भी नेता सत्ता में रह कर ही अपने दल का आसानी से विस्तार कर सकता है। अब ये अलग बात है कि बेटे संतोष सुमन ने पिता के स्टैंड पर ही सवाल उठा दिए हैं। मांझी घर में भी अकेले पड़ते दिख रहे हैं।

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