बिहार में 28 जनवरी की वो तारीख जब पहली बार किसी सीएम ने फेस किया नो कॉफिडेंस मोशन

28 जनवरी, बिहार में निगेटिव पॉलिटिक्स की एक न भूलने वाली तारीख है। 1968 में इसी दिन बिहार में पहली बार कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के कारण गिरी थी। बिहार की पहली गैर कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा को भीतरघात और साजिशों के कारण पद छोड़ना पड़ा था। वे बिहार के […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
बुधवार, 28 जनवरी 2026, 06:00 AM 6 मिनट read
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बिहार में 28 जनवरी की वो तारीख जब पहली बार किसी सीएम ने फेस किया नो कॉफिडेंस मोशन
Photo: UB India News Archive

28 जनवरी, बिहार में निगेटिव पॉलिटिक्स की एक न भूलने वाली तारीख है। 1968 में इसी दिन बिहार में पहली बार कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के कारण गिरी थी। बिहार की पहली गैर कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा को भीतरघात और साजिशों के कारण पद छोड़ना पड़ा था। वे बिहार के अति प्रतिभाशाली नेताओं में एक थे। उन्होंने 1929 में ICS की परीक्षा पास कर ली थी। वे आसानी से डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या कलेक्टर बन सकते थे। लेकिन उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की तरह ICS छोड़ कर देश सेवा का रास्ता चुना। फिर वे गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गये। पहले कांग्रेस में रहे फिर समाजवादी विचारधारा से जुड़ गये।

मुख्यमंत्री के हरा कर बने महानायक
1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 128 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी तो बनी लेकिन वह बहुमत से दूर रह गयी। बहुमत के लिए 160 का आंकड़ा चाहिए था। कुल सीटें 318 थीं। संसोपा 68 सीटें जीत कर दूसरी पर्टी बनी। इस चुनाव में सबसे चर्चित नेता रहे महामाया प्रसाद सिन्हा। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बिहार के मुख्यमंत्री केबी सहाय को हरा कर तहलका मचा दिया। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए केबी सहाय पटना पश्चिम सीट से चुनाव हार गये। बिहार के राजनीतिक इतिहास में पहली बार कोई सीटिंग सीएम चुनाव हारा था। इस जीत ने महामाया प्रसाद सिन्हा को 1967 में राजनीति का महानायक बना दिया था।

मुख्यमंत्री को हराने के इनाम में मिला सीएम पद
निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा राजा कामाख्या नारायण सिंह के जनक्रांति दल में आ गये। इस तरह जनक्रांति दल के 13 विधायक हो गये। जनसंघ के 25, प्रसोपा के 18 और कम्युनिस्ट पार्टी के 29 विधायक थे। 33 निर्दलीय जीते थे। इस तरह पहली गैर कांग्रेस सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। संसोपा सबसे बड़ा दल (68) था इसके विधायक दल के नेता कर्पूरी ठाकुर थे। इसलिए वे मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार थे। लेकिन राजा कामाख्या ने एक अनोखा प्रस्ताव रख दिया। उनका कहना था, चूंकि महामाया प्रसाद सिन्हा ने एक मुख्यमंत्री को हराने का कीर्तिमान बनाया है इसलिए उन्हें सीएम बना कर इस बड़े जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए। महामाया प्रसाद सिन्हा के रिकॉर्ड की धूम ने कर्पूरी ठाकुर को पीछे कर दिया। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने और कर्पूरी ठाकुर उप मुख्यमंत्री बने।

मिली जुली सरकार की मजबूरियां
चूंकि, महामाया प्रसाद सिन्हा ने कई दलों को मिला कर सरकार बनायी थी इसलिए उनका मंत्रिपरिषद विरोधाभासों पिटारा था। तीन मंत्री ऐसे थे जो किसी सदन के सदस्य नहीं थे- बीपी मंडल, बसंत नारायण सिंह और खलील अहमद। कांग्रेस से टूट कर चार विधायक आये थे उन्हें भी मंत्री बनाया गया था। बीपी मंडल संसोपा के सांसद थे लेकिन दबाव की राजनीति का सहारा लेकर वे भी राज्य सरकार में मंत्री बन गये थे। उस समय सत्ता लोलुपता चरम पर थी। मंत्री पद पाने के लिए हर तिकड़म आजमाया जा रहा था।

बीपी मंडल की मुख्यमंत्री से खुन्नस
लेकिन जब मुख्यमंत्री सिन्हा ने बीपी मंडल को छह महीने के अंदर विधान परिषद का सदस्य बनाने से इंकार कर दिया तो उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस खुन्नस में बीपी मंडल ने महामाया सरकार गिराने की जिद ठान ली। संसोपा के विधायक जगदेव प्रसाद इसलिए नाराज थे कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया था। बीपी मंडल और जगदेव प्रसाद ने हाथ मिला लिया। दोनों ने संसोपा तोड़ कर शोषित दल बना लिया। फिर महामाया सरकार को गिराने के लिए खिचड़ी पकने लगी।

कांग्रेस भी तिकड़म में शामिल
इस बीच कांग्रेस भी महामाया सरकार को गिराने की मुहिम में शामिल हो गयी। मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने पूर्ववर्ती कांग्रेसी मुख्यमंत्री केबी सहाय और उनके छह मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए अय्यर कमिशन का गठन किया था। इससे कांग्रेस नाराज थी। वह महामाया सरकार गिरा कर खुद सत्ता में आना चाहती थी। उस समय दल बदल कानून था नहीं इसलिए विधायकों का पाला बदलना बच्चों का खेल था। कांग्रेस को महामाया सरकार गिराने के लिए बीपी मंडल के रूप में एक मजबूत मोहरा मिल गया था।

बीपी मंडल की कांग्रेस से सौदेबाजी
कांग्रेस ने महामाया सरकार गिराने के लिए बीपी मंडल से सम्पर्क किया। बीपी मंडल ने शर्त रख दी कि वे तभी सरकार गिराने में मदद करेंगे जब कांग्रेस उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा करे। बिहार कांग्रेस के नेता और पूर्व सीएम विनोदानंद झा बीपी मंडल को समर्थन देने के खिलाफ थे। लेकिन उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी चाहती थीं कि महामाया सरकार किसी तरह गिर जाए। इंदिरा गांधी की हरी झंडी के बाद कांग्रेस ने बीपी मंडल की शर्त मान ली।

महामाया सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित
15 जनवरी 1968 को कांग्रेस ने बीपी मंडल के शोषित दल के साथ मिल कर महामाया सरकार के खिलाफ विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। 25 जनवरी को विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ। महामाया सरकार के पक्ष में 150 वोट जब कि विरोध में 163 वोट पड़े। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने से साबित हो गया कि महामाया सरकार ने बहुमत खो दिया है।

28 जनवरी 1968 को मुख्यमंत्री की इस्तीफा
फ्लोर टेस्ट में फेल होने के बाद मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की लेकिन राज्यपाल ने इसे नामंजूर कर दिया। राज्यपाल ने वैकल्पिक सरकार के गठन का रास्ता खुला रखा। तीन बाद यानी 28 जनवरी 1968 को मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने त्यागपत्र दे दिया। उसी दिन शोषित दल के सतीश प्रसाद सिंह ने नये मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

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