राज्यसभा के लिए क्यों तैयार हुए नीतीश ?

सियासत की तासीर गजब होती है. हर किसी को एक जैसा हाजमा नहीं देता. यही नहीं किसी को सुबह परोसा गया तड़का हजम हो जाए तो उसी को शाम वाले से अपच हो सकती है. हर मंजा हुआ खिलाड़ी सियासी तड़का लगाने में माहिर है. कहा जाता है कि रणभूमि और राजनीति में जीत हमेशा […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 6 मार्च 2026, 05:47 AM 7 मिनट read
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राज्यसभा के लिए क्यों तैयार हुए नीतीश ?
Photo: UB India News Archive

सियासत की तासीर गजब होती है. हर किसी को एक जैसा हाजमा नहीं देता. यही नहीं किसी को सुबह परोसा गया तड़का हजम हो जाए तो उसी को शाम वाले से अपच हो सकती है. हर मंजा हुआ खिलाड़ी सियासी तड़का लगाने में माहिर है. कहा जाता है कि रणभूमि और राजनीति में जीत हमेशा रणनीति से तय होती है। इतिहास गवाह है कि हमेशा ताकत काम नहीं आती, बल्कि सही समय पर बनाई गई सटीक योजना ही जीत में भूमिका निभाती है। इस वक्त दुनिया में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इस्राइल का ऑपरेशन एपिक फ्यूरी चल रहा है, तो बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ ऑपरेशन लोटस सफल होता दिख रहा है।

लोकतंत्र की यही खूबसूरती है. सत्ता से बाहर रहने के लिए चुनाव में हारने की जरूरत नहीं पड़ती. और सत्ता में बने रहने के लिए सिर्फ चुनाव जीतना जरूरी नहीं है.

राजनीति में शुचिता के नायक और यू-टर्न पॉलिटिक्स से पहले सिद्धांतवादी राजनीति के पुरोधा समाजवादी नीतीश कुमार अचानक ये तय करते हैं कि अब बहुत हुआ. सीएम की कुर्सी को चीमटे से भी नहीं छुएंगे. अचानक वो हर बाराती सन्न रह गया जो जनमासे पर एक ही दूल्हा देखने का आदि था. बीस साल में बाराती बने न जाने कितने वोटर परलोक सिधार गए और करोड़ों नए बाराती बने, उनमें कभी कन्फ्यूजन नहीं रहा कि दूल्हा कौन होगा. फिर विकास पुरुष ने ऐसा क्यों किया?

पच्चीस से तीस – फिर से नीतीश, जब बात बिहार की हो – नाम सिर्फ नतीश का हो.. ये सब नारे अभी तो लगे थे छठ पूजा के समय. चिराग पासवान, अमित शाह, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी सबने कहा था कि एक ही बात में कोई कन्फ्यूजन नहीं है कि नीतीश कुमार बिल्कुल फिट हैं और सीएम वही बनेंगे. मुझे भी लगा कि ज्योति बसु और नवीन पटनायक का रेकॉर्ड नीतीश कुमार ही तोड़ेंगे. लेकिन सुशासन बाबू को अचानक क्या हुआ? माना कि राज्यसभा राज्यों कि प्रतिनिधि सभा मानी जाती है. लेकिन वहां जाने की जरूरत तब थी अगर डबल इंजन न हो. सारे करीबी चाहे विजय चौधरी हों या सम्राट चौधरी और पार्टी के बाकी नेता सोशल मीडिया पर उनसे उम्मीद कर रहे हैं कि वो बिहार की आवाज सदन में उठाएंगे. गजब लॉजिक है. जब फैसला नीतीश कुमार ने खुद लिया है तो लॉजिक पर चर्चा ही नहीं होनी चाहिए. चाहे तेजस्वी यादव कितना भी कहें कि ये महाराष्ट्र फॉर्मूला था. नीतीश के करीबी जेडीयू नेता तो यही बता रहे कि उनका फैसला था.

अपने ही बने मोहरा
ऑपरेशन लोटस में अक्सर विरोधी खेमा भी हिस्सा बनता है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। जनता दल (यूनाइटेड) के कुछ सांसदों को BJP ने मोहरा बनाया। BJP चाहती थी कि इस बार मुख्यमंत्री उसकी पार्टी से बने। अब शायद उसका यह सपना पूरा होने वाला है। मगर, सबसे बड़ी बात है कि नीतीश ने मुख्यमंत्री का पद छोड़कर राज्यसभा जाने का निर्णय लिया। जिस कुर्सी पर वह 20 वर्षों से काबिज थे, अचानक उसे छोड़ने की इच्छा क्यों हो गई। सवाल तो यह भी है कि उनकी यह ख्वाहिश राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान क्यों नहीं हुई। अब पटना छोड़कर दिल्ली जाना क्यों।

क्या रहा कारण

सियासी गलियारे में कई बातें हो रही हैं। क्या BJP का दबाव है या अपने बेटे निशांत के राजनीतिक भविष्य के लिए खुद नीतीश ऐसा कर रहे हैं। उनके बारे में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था। मगर कई बार हमारी जिंदगी में ऐसे हालात आते हैं जब सिद्धांत और उसूल त्यागने पड़ते हैं। इस बार नीतीश का रुख भी कुछ यही बयां कर रहा है।

ये तो होना ही था
हाल के दिनों में नीतीश कुमार की अजीब हरकतों से पार्टी, सरकार और सहयोगी BJP परेशान रही। विधानसभा, चुनावी सभा या सरकारी कार्यक्रम में उनकी हरकतें प्रदेश और देश में चर्चा का विषय बन गई। पिछले दो साल में नीतीश कुमार ने न मीडिया में इंटरव्यू दिया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। शायद इसलिए उन्होंने सीएम पद छोड़कर राज्यसभा जाने का निर्णय लिया।

महाराष्ट्र का उदाहरण
देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार है, जिनमें 14 राज्यों में BJP के मुख्यमंत्री हैं। पार्टी हमेशा अधिक सीटों वाले राज्यों में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। महाराष्ट्र में BJP और शिवसेना गठबंधन में थी, लेकिन उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। BJP ने मना किया, तो उद्धव ने कांग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाई। बाद में BJP ने शिवसेना को तोड़कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया। बिहार में भी BJP की नजर लगातार मुख्यमंत्री पद पर रही। 2020 में नीतीश की पार्टी तीसरे नंबर पर थी, फिर भी BJP ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।

BJP की चाल
भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में NDA की जीत के बाद नीतीश CM बने। मगर, BJP ने गृहमंत्री का पद ले लिया। अब उनकी प्राथमिकता स्वास्थ्य और बेटे निशांत के भविष्य की लग रही है। लग रहा है कि नीतीश BJP की शरण में चले गए हैं। राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद संभावना है कि उन्हें पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। ये पहली बार होगा जब नीतीश पीएम मोदी के नेतृत्व में काम करेंगे। मगर, सवाल है कि मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने में ही राज्यसभा जाने की इच्छा क्यों हुई।

कौन बनेगा CM
नीतीश नफा-नुकसान दोनों को बखूबी भांप लेते हैं। वहीं BJP की रणनीति संयमित और दीर्घकालिक होती है। JDU में फिलहाल कोई मजबूत मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं है और निशांत भी बिना विधान परिषद या विधानसभा सदस्य बने सीएम नहीं बन सकते। राजीव गांधी, हेमंत सोरेन और राबड़ी देवी जैसे कई उदाहरण हैं, जो इतिहास में राजनीति में अप्रत्याशित रहे हैं। अब कयास हैं कि BJP पिछड़ा वर्ग से सीएम चेहरा पेश कर सकती है। इनमें सम्राट चौधरी, दिलीप जायसवाल और नित्यानंद राय का नाम है। हालांकि, फैसला पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ही करना है।

निशांत क्या करेंगे
नीतीश ने 20 साल तक बिना बहुमत मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी चाणक्य नीति दिखाई। उनके दिल्ली जाने के फैसले और विधान परिषद छोड़ने के बाद बेटे निशांत के संभावित डिप्टी सीएम बनने के कयास हैं। हालांकि आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। नीतीश हमेशा पार्टी और कार्यकर्ताओं का संतुलन रखते हैं। अब निशांत की भूमिका और सरकार में उनका पद क्या रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

कार्यकर्ता सन्न, नेता प्रसन्न
नीतीश के बहनोई अनिल कुमार बोल रहे कि बिहार और नीतीश के साथ ठीक नहीं हुआ. सरयू राय जैसे कुछ नेता भी दबी जुबां समर्थन कर रहे. लेकिन नेताओं के विपरीत जेडीयू के कार्यकर्ता तोड़फोड़ कर रहे. वो अपने नेता को दिल्ली में नहीं पटना में देखना चाहते हैं. इधर ललन सिंह, अशोक चौधरी , श्रवण कुमार, नीरज कुमार जैसे नेता नीतीश के फैसले का सम्मान करना चाहते हैं. आप समझ रहे होंगे. फिर भी ऐसा नहीं है कि कोशिशें कम हुईं. मनाने की. ललन सिंह ने मनाने के बाद मिली विफलता पर कहा कि – ये पार्टी उनकी है , फैसला उनका है. हम क्या करें. फिर खबर आई कि बेटा निशांत भी मना रहा है लेकिन नीतीश नहीं मान रहे. फिर ललन सिंह, संजय झा और नीतीश कुमार आपस में बैठते हैं. बैठक के बाद कमरे से नहीं एक्स यानी पूर्ववर्ती ट्विटर पर नीतीश कुमार का संदेश निकलता है. वो उस अधूरी ख्वाहिश का जिक्र करते हैं जिसे 2022 में पहली बार सामने रखा था – मैं विधानसभा, लोकसभा, विधान परिषद हर सदन का सदस्य रहा और चाहता हूं एक बार राज्यसभा भी जाऊं. उस अधूरी ख्वाहिश को मनोज झा जैसे नेता उधार के शब्द बता रहे और आरोप लगा रहे कि ये मैसेज भी किसी और ने लिखा है.
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