पहली बार 2005 में नीतीश कुमार को सीएम बनने का प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था. नीतीश कुमार बड़ी ईमानदारी से यह बात स्वीकार भी करते हैं. उससे पहले नीतीश उनके मंत्रिमंडल में रेल मंत्री की भूमिका निभा चुके थे. भले नीतीश ने 2 मौकों पर भाजपा से मुंह मोड़ा, लेकिन लौटे तो भाजपा ने उन्हें खुले मन से गले लगाया. 2020 में चुनाव नतीजे जब नीतीश के अनुकूल नहीं आए और उनसे अधिक सीटें भाजपा की झोली में गईं, तब भी भाजपा ने उन्हें मान दिया. उनके ना-नुकुर के बावजूद उन्हें भाजपा ने सीएम बनाया. भाजपा अगर उन्हें इतना सम्मान देती रही है तो कैसे माना जाए कि ववह उनके खिलाफ साजिश रचेगी!
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले में विरोधियों को साजिश नजर आ रही है. राजद नेता तेजस्वी यादव इसे नीतीश कुमार के साथ भाजपा का विश्वासघात बता रहे हैं. तेजस्वी यह भूल जाते हैं कि उन्होंने 3-4 महीने पहले नीतीश कुमार को नीचा दिखाने के लिए उनके बारे में क्या-क्या टिप्पणी नहीं की. राज्यसभा जाने के नीतीश के फैसले से पहले भी तेजस्वी और उनकी पार्टी नीतीश पर उसी अंदाज में हमलावर रही है. उन्हें बूढ़ा, बीमार और लाचार बताया गया. हाल तक वे उनके खिलाफ हल्ला बोल अभियान में लगे हुए थे. अब उन्हें इस काम में भाजपा की साजिश दिख रही है.
नीतीश कुमार को बेचारा समझने वाले भूल जाते हैं कि अब तक स्वाभिमान से समझौता नहीं करने वाले नीतीश ने राज्यसभा जाने का फैसला किसी के दबाव या प्रभाव में आकर नहीं लिया है. उन्होंने तो साफ-साफ बता दिया है कि सभी विधायी सदन देखने की उनकी इच्छा रही है. विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के वे सदस्य रह चुके हैं. राज्यसभा बाकी था. इस बार वे यह इच्छा भी पूरी कर लेना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने न सिर्फ सोशल मीडिया पर बयान जारी किया, बल्कि वीडियो जारी कर भी स्थिति स्ष्ट की.
नीतीश के पास भाजपा से महज 4 विधायक ही कम हैं. भाजपा के बिहार में 89 विधायक हैं तो जेडीयू के 85 हैं. वे न चाहें तो भाजपा का सीएम नहीं बन सकता. यह भी कि वे चाहें तो सत्ता सुख के लिए तिलमिला रहे तेजस्वी के नेतृत्व वाले महागठबंधन और दूसरे विपक्षी दलों के साथ सरकार बना सकते हैं. पर, उन्हें महागठबंधन के साथ काम करने का कटु अनुभव है. वे कहते भी रहे हैं कि 2 बार इधर-उधर जाकर उनसे गलती हुई. वे कई मौकों पर यह बात कह चुके हैं कि अब वे वैसी गलती नहीं करेंगे. इसलिए राज्यसभा जाने के उनके फैसले को साजिश कहना कहीं से भी उचित नहीं लगता. नीतीश को राजनीति का चाणक्य कहने वाले यह भी जानते हैं कि वे किसी के दबाव में नहीं आते. जब उनके पास सिर्फ 43 विधायक थे, जब भी उन्होंने किसी के दबाव में काम नहीं किया. दबाव महसूस हुआ तो उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ा और उधर नाराजगी हुई तो भाजपा के साथ लौट आए. अब तो उनके 85 विधायक हैं. ऐसे में भाजपा पर वे अब ी भारी हैं. वे न चाहते तो कोई जबरन उन्हें राज्यसभा नहीं बेज पाता.







