कहीं सम्राट चौधरी का हाल सुशील मोदी जैसा न हो जाए!

बीजेपी खामोश है। लेकिन नीतीश कुमार बार-बार सम्राट चौधरी की भावी कुर्सी की तरफ इशारा कर रहे हैं। ऐसा क्यों? क्या नीतीश कुमार बीजेपी को फंसाने के लिए जाल बिछा रहे हैं? क्या ऐसा करके नीतीश कुमार बीजेपी पर एक अघोषित दबाव बना रहे हैं कि वह आने वाले समय में उनकी पसंद के नेता […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शुक्रवार, 20 मार्च 2026, 09:41 AM 5 मिनट read
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कहीं सम्राट चौधरी का हाल सुशील मोदी जैसा न हो जाए!
Photo: UB India News Archive

बीजेपी खामोश है। लेकिन नीतीश कुमार बार-बार सम्राट चौधरी की भावी कुर्सी की तरफ इशारा कर रहे हैं। ऐसा क्यों? क्या नीतीश कुमार बीजेपी को फंसाने के लिए जाल बिछा रहे हैं? क्या ऐसा करके नीतीश कुमार बीजेपी पर एक अघोषित दबाव बना रहे हैं कि वह आने वाले समय में उनकी पसंद के नेता को ही सीएम बनाए?

ये बीजेपी का आंतरिक मामला है। फिर नीतीश कुमार ने किस हैसियत से यह कह दिया कि आगे यही (सम्राट चौधरी) काम देखेंगे। क्या नीतीश कुमार ‘लव-कुश’ की जोड़ी कायम रखने का श्रेय लेने के लिए यह सब कर रहे हैं? लेकिन प्रधानमंत्र नरेंद्र मोदी का जो मन-मिजाज है, उसको देखते हुए नीतीश कुमार की ये चाल कहीं उल्टी न पड़ जाए।

क्या नीतीश बीजेपी के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं?

बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसका कोई अहम फैसला केवल पटना में बैठ कर नहीं लिया जा सकता। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी के आंतरिक मामले में किसी बाहरी का दखल बर्दाश्त करने वाले नहीं। तो क्या ऐसा करके नीतीश कुमार सम्राट चौधरी की राह में कांटे बिछा रहे हैं? कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार जानबूझकर यह संकेत दे रहे हैं कि सम्राट चौधरी ही उनकी जगह लेंगे।

इसके दो नतीजे हो सकते हैं। अगर भाजपा सम्राट चौधरी की ताजपोशी नहीं करती है तो उसके कुशवाहा वोटर नाराज हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो बीजेपी कमजोर हो सकती है जो जदयू के लिए फायदेमंद बात होगी। दूसरी बात ये होगी अगर सम्राट चौधरी को कुर्सी मिलती है तो इसका श्रेय वे खुद ले सकते हैं। वह कह सकते हैं कि मैंने तो बहुत पहले ही इसका संकेत दे दिया था। दोनों ही स्थितियों में जदयू को फायदा मिलता दिख रहा है।

धर्मसंकट में फंसी बीजेपी, विरोध भी नहीं सर सकती

नीतीश कुमार ने बीजेपी को एक तरह से सियासी जाल में फंसा दिया है। धर्मसंकट में फंसी बीजेपी अब खुलकर ये भी नहीं कह सकती कि वह सम्राट चौधरी की बजाय किसी और को अपनी पसंद का सीएम बनाएगी। मजबूरी में उसने खामोशी ओढ़ ली है। वह चुपचाप नीतीश कुमार के इस्तीफे का इंतजार कर रही है। उसके पहले वह पत्ते खोल कर अपनी चाल को बेअसर नहीं करना चाहती। सार्वजनिक सभाओं में नीतीश कुमार बार-बार सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रख रहे हैं। अपनापन दिखा रहे हैं। वे जानते हैं कि जनता के बीच इन प्रतीकों से क्या संदेश जाएगा।

लव-कुश एकता का श्रेय लेने की कोशिश

नीतीश यह जताना चाहते हैं कि बिहार में लव-कुश एकता को कायम रखने के लिए उन्होंने ही भाजपा के कुशवाहा नेता (सम्राट चौधरी) को सीएम पद के लिए प्रोजेक्ट किया। नीतीश कुमार समता पार्टी के जमाने से ही लव-कुश एकता के लिए पसीना बहाते रहे हैं। दिल्ली जाने से पहले वे बिहार में अपने राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह संतुलित कर लेना चाहते हैं। आमतौर पर नीतीश कुमार शासकीय कामकाज में ढिलाई बर्दाश्त नहीं करते। जो मंत्री परफॉर्म नहीं करते उनकी अक्सर क्लास लगाते रहते हैं। लेकिन भविष्य की राजनीति के चलते सम्राट चौधरी के मामले में नीतीश कुमार उदार दिख रहे हैं।

विपक्ष के निशाने पर रहे गृह मंत्री और मुख्यमंत्री

सम्राट चौधरी को स्वतंत्र रूप से गृह मंत्री बनाना बिहार की राजनीति के लिए एक निर्णायक घटना है। धारणा ये बनी थी कि बिहार लॉ एंड आर्डर के मामले में एक मिसाल कायम करेगा। लेकिन विपक्ष ने सदन से लेकर सड़क तक, गिरती कानून व्यवस्था को लेकर जिस तरह से गृह मंत्री और मुख्यमंत्री को घेरा, उससे सरकार की बहुत किरकिरी हुई। नीट छात्रा मामले में तो सरकार की फजीहत हो गयी। लेकिन नीतीश कुमार, गृह मंत्री के कामकाज पर बिल्कुल खामोश रहे। इससे बिहार एनडीए की छवि भी धूमिल हुई। बिहार पुलिस हो या सीबीआई, अभी तक नीट छात्रा को इंसाफ दिलाने के मामले में, दोनों ने ही निराश किया है। इन झटकों को भुला कर नीतीश कुमार एक तरह से भाजपा को रिमोट से कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं।

कहीं सम्राट चौधरी का हाल सुशील मोदी जैसा न हो जाए!

ऐसा न हो कि नीतीश कुमार के कारण सम्राट चौधरी का हाल कहीं सुशील कुमार मोदी (अब दिवंगत) की तरह हो जाए। 2005 के बाद बिहार में जदयू के नीतीश कुमार और भाजपा के सुशील कुमार मोदी की जोड़ी कुछ ऐसी जमी कि बाद में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को नागवार गुजरने लगी। भाजपा के मोदी युग में तो ये बात नाकाबिले बर्दाश्त हो गयी।

सुशील कुमार मोदी को ‘नीतीश प्रिय’

होने की कीमत चुकानी पड़ी। जिस सुशील कुमार मोदी तो बिहार भाजपा का भावी मुख्यमंत्री माना जा रहा था उन्हें पटना से हटा कर दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। मजबूर होकर नीतीश कुमार को बिहार में भाजपा की पसंद के नेताओं के साथ काम करना पड़ा। अब एक बार फिर जो सीन क्रिएट हो रहे हैं, उसके चलते सम्राट चौधरी पर भी ‘नीतीश प्रिय’ होने का आरोप लग रहा है। नतीजे की
कल्पना की जा सकती है।

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