आशीर्वाद पोलिटिक्स : बिहार की राजनीति में अभी काफी कुछ बदलना बाकी………………

बिहार कई चीजें काफी तेजी से बदल रही है। जहां कभी नीतीश कुमार आया-जाया करते थे, वहां पर अब उनके बेटे निशांत आने-जाने लगे हैं। पटना के गांधी मैदान में इस साल ईद का नजारा कुछ अलग और राजनीतिक रूप से काफी अहम रहा। पिछले 20 वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़ते हुए […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
शनिवार, 21 मार्च 2026, 05:58 AM 9 मिनट read
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आशीर्वाद पोलिटिक्स : बिहार की राजनीति में अभी काफी कुछ बदलना बाकी………………
Photo: UB India News Archive

बिहार कई चीजें काफी तेजी से बदल रही है। जहां कभी नीतीश कुमार आया-जाया करते थे, वहां पर अब उनके बेटे निशांत आने-जाने लगे हैं। पटना के गांधी मैदान में इस साल ईद का नजारा कुछ अलग और राजनीतिक रूप से काफी अहम रहा। पिछले 20 वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़ते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ईद के मौके पर मैदान में मौजूद नहीं रहे। उनकी जगह उनके बेटे निशांत कुमार ने कार्यक्रम में शिरकत की और लोगों को मुबारकबाद दी। हालांकि, असली हलचल तब शुरू हुई जब निशांत गांधी मैदान से निकलकर सीधे जेडीयू के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के आवास पहुंचे। इन दोनों के बीच हुई 15 मिनट की गोपनीय मुलाकात ने बिहार के सियासी गलियारों में कयासों का बाजार गर्म कर दिया है।

JDU नेता निशांत कुमार ईद-उल-फितर के मौके पर पटना के गांधी मैदान पहुंचे। उन्होंने कहा, “ईद के इस पाक अवसर पर मैं अपनी तरफ से, मेरे पिता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से देशवासियों और बिहार वासियों को बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएं देता हूं…”

20 में पहली बार गांधी मैदान नहीं पहुंचे सीएम नीतीश
बिहार की सियासत में ये एक स्थापित परंपरा रही है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद गांधी मैदान पहुंचकर ईद की नमाज के बाद मुस्लिम समुदाय से मिलते थे। इस साल उनकी गैरहाजिरी चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि, प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे, लेकिन मुख्यमंत्री की कमी को उनके बेटे निशांत की मौजूदगी ने एक नया राजनीतिक मतलब दे दिया है।

सियासत में निशांत कुमार का बढ़ता राजनीतिक कद

निशांत कुमार अब तक सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे, मगर अब उनके तेवरों में हाल के कुछ दिनों में बड़ा बदलाव आया है। जेडीयू की सदस्यता लेने के बाद उनकी सार्वजनिक सक्रियता को ‘पॉलिटिकल ट्रेनिंग’ के रूप में देखा जा रहा है। गांधी मैदान में उनकी मौजूदगी को नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किए जाने के संकेत के रूप में लिया जा रहा है।
निशांत कुमार की सुरक्षा में सीएम सिक्योरिटी तैनात रही। उनके साथ अशोक चौधरी समेत जदयू के कई बड़े नेता मौजूद रहे। मंच पर मुस्लिम नेताओं ने निशांत कुमार को गमछा ओढ़ाकर स्वागत किया।
निशांत की ललन सिंह के साथ बंद कमरे में बैठक
निशांत कुमार और ललन सिंह के बीच हुई 15 मिनट की ‘सीक्रेट मीटिंग’ इस पूरी घटना का सबसे इंट्रेस्टिंग मोड़ रहा। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में आगामी चुनावी रणनीति और पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलावों पर चर्चा हुई है। हालांकि, इसे औपचारिक तौर पर ‘शिष्टाचार भेंट’ कहा जा रहा है, लेकिन बैठक के समय और स्थान ने ध्यान जरूर खींचा।
बिहार की राजनीति में अभी काफी कुछ बदलना बाकी
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बड़े सार्वजनिक मंचों से दूरी बनाना और निशांत का वरिष्ठ नेताओं से मिलना-जुलना, जेडीयू के भीतर एक नए युग की शुरुआत की ओर इशारा करता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी अब नए चेहरों और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है, जिसमें निशांत की भूमिका आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
नीतीश कुमार के नमाज में शामिल नहीं होने पर कांग्रेस ने तंज कसा है। पार्टी प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा, ’20 साल से लोगों को टोपी तो पहना ही रहे हैं। अब और कितना टोपी पहनाते। लोग समझ गए है कि नीतीश कुमार ऐसे खिलाड़ी है, जो उस आदमी को ताकत दे रहे हैं, जिसने गुजरात में न जाने क्या-क्या करवाया था। तो अब उनकी पोल खुल चुकी है। इसलिए शायद इस बार शर्मिदगी महसूस हुई हो और गांधी मैदान नहीं गए हों।’
आशीर्वाद पोलिटिक्स की खूब चर्चा
बिहार में इन दिनों आशीर्वाद पोलिटिक्स की खूब चर्चा हो रही है. सीए नीतीश कुमार अपनी समृद्धि यात्रा के दौरान होने वाले जन संवाद कार्यक्रमों में डिप्टी सीएम म्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखते दखते हैं. लोग इसे सम्राट के अगला सीएम बनने का आशीर्वाद मान रहे हैं. सम्राट को नीतीश के आशीर्वाद का एक अंदाज उनका वह उद्गार भी है, जिसमें वे उनके कंधे पर हाथ रख कर जनता से कहते हैं कि अब सब काम यही करेंगे. इस क्रम में पुरानी बातों की चर्चा भी हो रही है. नीतीश कुमार ने राजद के साथ रहते 2023 में तेजस्वी यादव को भी इसी तरह का आशीर्वाद दिया था. पर, तेजस्वी पर उनका आशीर्वाद फलित नहीं हुआ.
सम्राट के कंधे पर हाथ के मायने
नीतीश कुमार ने अपनी समृद्धि यात्रा के दौरान सम्राट चौधरी के कंधे पर आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ रखा. ऐसा एक जगह नहीं कई जनसंवाद कार्यक्रमों के दौरान हुआ. इसका अर्थ मौजूदा सियासी हालात में समझा जा सकता है. नीतीश राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हो चुके हैं. पहले से वे एमएलसी हैं. जाहिर है कि उनका ताजा चयन ही बेहतर होगा. यानी उनके एमएलसी पद छोड़ने की प्रबल संभावना है. जब वे एमएलसी नहीं रहेंगे तो सीएम भी नहीं रह पाएंगे. इसके साथ ही राजनीतिक हलकों में सम्राट चौधरी के ही अगला सीएम बनने के कयास लग रहे हैं. ऐसे में सम्राट के कंधे पर हाथ रखने का आशय समझना कठिन नहीं.
यह भी- ‘सब काम अब यही करेंगे!’
यही नहीं, नीतीश ने अपनी कुछ सभाओं में यह भी कह दिया कि ‘सब काम अब यही करेंगे.’ पीठ पर हाथ रखने को आशीर्वाद का शारीरिक संकेत मानें तो उनके बोलने के इस अंदाज से क्या यह संकेत नहीं मिलता कि उनके न रहने पर सीएम पद के लिए सम्राट ही उनकी असली पसंद हैं. इतना तो तय है कि अगला सीएम भाजपा का ही होगा, लेकिन भाजपा जब तक किसी का नाम घोषित न करे, तब तक पक्के तौर पर यह मान लेना कि सम्राट ही सीएम होंगे, उचित नहीं होगा. ऐसा इसिलए कि भाजपा अपने फैसलों से चौंकाती रही है. मध्य प्रदेश, दिल्ली जैसे राज्यों में सीएम के लिए लग रही अटकलों से इतर भाजपा का निर्णय रहा है. पर, नीतीश कुमा जिस अंदाज में सम्राट को आशीर्वाद दे रहे हैं, उससे यही संकेत मिल रहा है कि वे ही अगला सीएम हैं.
नीतीश ही तय करेंगे उत्तराधिकारी
जेडीयू के नेता कहते रहे हैं कि अगला सीएम नीतीश कुमार की ही पसंद का होगा. केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी कहा है कि नीतीश ने ही उन्हें सीएम बनाया था तो अगले सीएम के चयन में भी उनकी ही पसंद मान्य होगी. यानी दिल्ली जाने पर वे सम्राट को ही अपना शासकीय उत्तराधिकारी बनाना चाहेंगे. जब से नीतीश कुमार के दिल्ली जाने की चर्चा चली, तभी से उनके उत्तराधिकारी की अटकलें लगने लगीं. सम्राट के बारे में नीतीश भले संकेत दे रहे हों, लेकिन भाजपा खामोश है. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार ने झा ने नीतीश जहां सम्राट को आशीर्वाद दे रहे हैं, वहीं उनकी पार्टी जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार ने झा का कहना है कि अभी सीएम के लिए कोई नाम फाइनल नहीं हुआ है. संजय के इस बयान से इस अंदेशे को बल मिलता है कि नीतीश के सीएएम न रहने पर कहीं जेडीयू अपने किसी आदमी को तो सीएम बनाना नहीं चाहता. निशांत कुमार को सीएम बनाने की मांग जेडीयू कर ही रहा है.
तेजस्वी को भी दिया था आशीर्वाद!
बहरहाल, नीतीश कुमार ऐसा आशीर्वाद देने में उदारता दिखाते रहे हैं. महागठबंधन का मुखिया रहते तेजस्वी यादव को भी नीतीश ने ऐसा ही आशीर्वाद दिया था. वे बार-बार कहते थे कि आगे से सब इन्हीं (तेजस्वी) को देखना है.. एक बार तो नीतीश ने आशीर्वाद के अंदाज में यहां तक कह दिया था कि अगला चुनाव (2026) तेजस्वी के ही नेतृत्व में महागठबंधन लड़ेगा. तब नीतीश राजद के साथ महागठबंधन के नेता बतौर सीएम थे. राजद प्रमुख लालू यादव ने उन्हें (नीतीश) पीएम पद के लिए आशीर्वाद दे दिया था. राजद के नेता इसे खूब प्रचारित करते थे. तब के प्रदेश अध्यक्ष रहे जगदानंद सिंह फख्र के साथ कहते कि लालू जिसे आशीर्वाद देते हैं, वह जरूर पीएम बनता है. वे एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के नाम भी गिनाते. नीतीश ने 2024 में राजद का साथ छोड़ दिया. तेजस्वी आशीर्वाद पाकर भी ताकते रह गए.
नीतीश की कथनी-करनी में फर्क!
नीतीश कुमार अपने फैसले भी बदलते रहे हैं. इसे उनकी कथनी-करनी का फर्क भी मान सकते हैं. नौकरी के वादे पर तेजस्वी को 2020 में नीतीश ने क्या कहा था- पैसे कहां से आएंगे. अब खुद 1 करोड़ नौकरी का निश्चय बार-बार दोहरा रहे हैं. 40 लाख लोगों को नौकरी-रोजगार मिल चुकने की बात भी बता रहे हैं. बिजली पर उनके स्टैंड को देख लीजिए. कभी मुफ्त की बिजली देने से साफ मना किया तो बाद में 125 यूनिट बिजली फ्री कर दी. लालू यादव की वंशवादी राजनीति का विरोध करते उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच कर खुद वहीं काम कर लिया. उन्होंने अपने बेटे निशांत को आखिरकार राजनीति में उतार दिया. नीतीश के और भी कुछ फैसले होंगे, जिनका कोई औचित्य ही अब नहीं रहा.
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