यह सवाल इसलिए कि नीतीश की तरह निशांत राजनीति में परिपक्व नहीं हैं. दूसरा कि नीतीश ने मजबूत सेकेंड लाइन डेवलप ही नहीं होने दिया. जार्ज फर्नांडीस, शरद यादव, आरसीपी सिंह जैसे नेताओं को नीतीश ने सामने जरूर किया, लेकिन उन्हें धरती भी उन्होंने ही धरा दी. जन सुराज पार्टी के अभी प्रमुख बने प्रशांत किशोर को भी नीतीश ने जेडीयू से जोड़ा था. उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर नीतीश ने नया नेतृत्व डेवलप करने का संकेत दिया. पर, यह यारी भी ज्यादा दिन तक नहीं चली. प्रशांत किशोर न सिर्फ जेडीयू से अलग हो गए, बल्कि राजनीतिक पार्टी बना कर नीतीश के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया. आरसीपी की तरह ही आईएएस की नौकरी छोड़ मनीष वर्मा भी जेडीयू से जुड़े. तब भी माना गया कि वे नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी बनेंगे. उत्तराधिकारी की जरूरत इसलिए महसूस होती रही है कि जेडीयू में दूसरी पंक्ति का सबल नेतृत्व ही कभी नहीं रहा. पार्टी में अध्यक्ष जरूर बनते-हटते रहे, लेकिन कंट्रोल हमेशा नीतीश कुमार ने अपने हाथ ही में ही रखा.
पहले समता पार्टी और बाद में जेडीयू के अस्तित्व में आने के बाद लोकतांत्रिक अंदाज में अध्यक्ष बनते-बदलते रहे, लेकिन आरंभ से ही पार्टी के फैसले नीतीश कुमार ही लेते रहे. 20 साल से बिहार का सीएम रहने के कारण पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रही. सीएम के रुतबे के कारण भी पार्टी में उनकी मर्जी के खिलाफ कोई फैसला कभी संभव नहीं रहा. यानी जेडीयू में सुप्रीमो और आलाकमान का कल्चर हावी रहा. एनडीए के साथ ज्यादा वक्त बिताने के बाद भी नीतीश ने 2 बार गठबंधन बदला. यह फैसला पूरी तरह उनका था. जेडीयू में इसे लेकर कसमसाहट थी, पर सुप्रीमो संस्कृति के आगे सभी लाचार थे. अब जेडीयू नेताओं को इस संस्कृति का खामियाजा भोगना पड़ रहा है. पहले पार्टी में नीतीश के अलावा किसी को जुबान खोलने की हिम्मत नहीं होती थी. उनके फैसले पर सवाल उठाना तो सपने में भी संभव नहीं था. अब स्थिति बदल गई है. राज्यसभा जाने का फैसला उनका है. भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए, यह खुद वे ही कह रहे हैं. इसके बावजूद जेडीयू दफ्तर में जैसा उत्पाद मचा, वह उनके नेतृत्व में आई कमजोरी का परिणाम है.
नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ रहते हुए 2 बार गठबंधन बदला. पहला 2015 में और दूसरी बार 2022 में. हर बार यह फैसला पूरी तरह उनका व्यक्तिगत था. पार्टी में कसमसाहट थी, लेकिन सुप्रीमो संस्कृति के आगे सब चुप रहे. एनडीए में रहने से जेडीयू को कई लाभ मिले. केंद्र की योजनाओं का फायदा, विकास कार्यों के लिए फंड, स्थिर सरकार और विपक्षी दलों पर दबाव बनाने में सहूलियत रही. जब-जब जेडीयू एनडीए से अलग हुआ तो सत्ता और संगठन दोनों को नुकसान पहुंचा. वे तो अब खुलेआम कहते हैं कि 2 मौकों पर एनडीए से अलग होकर उन्होंने बड़ी गलती कर दी थी. अब वे उसे नहीं दोहराएंगे. उन्हें साथ रहते आरजेडी का दबाव महसूस किया. राजद नेताओं की गड़बड़ियां भी झेलीं. इसीलिए वे कहते हैं कि जब गड़बड़ करने लगा तो हमने साथ छोड़ दिया. नीतीश के राज्यसभा जाने से आरजेडी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल खुश हैं. वे इसे जेडीयू के कमजोर होने का मौका मान रहे हैं. आगे चल कर भाजपा भी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी ही. राजद नेता तेजस्वी यादव बार-बार यह कह कर एनडीए में फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं कि नीतीश को भाजपा ने जबरन सीएम से हटा कर राज्यसभा ले जा रही है.
नीतीश कुमार की राज्यसभा यात्रा जेडीयू के लिए एक नया मोड़ है. यदि पार्टी सेकंड लाइन विकसित कर पाती है और निशांत कुमार पिता की विरासत को ठीक से संभालते हैं तो जेडीयू की मजबूती बरकरार रहेगी. थोड़ी भी कमजोरी हुई तो पार्टी का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है. पार्टीी को सबसे पहले सुप्रीमो संस्कृति से बाहर निकलना होगा. जेडीयू को लोकतांत्रिक और सामूहिक नेतृत्व की ओर बढ़ाना होगा. नए क्षेत्रों में पार्टी का विस्तार भी जरूरी है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष की मंशा पूरी हो जाएगी. तेजस्वी यादव तो इसी का इंतजार कर रहे हैं. विधानसभा चुनाव 2025 के पहले से ही जेडीयू को कमजोर करने के लिए नीतीश को बीमार, बूढ़ा और लाचार बताते रहे हैं. वे तब यह भी कहते थे कि भाजपा नीतीश को मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी. अब, जब नीतीश राज्यसभा जा रहे हैं तो तेजस्वी अपनी बात की सच्चाई का बखान करते नहीं थक रहे हैं. जेडीयू में फूट डालने के लिए वे यह भी कह रहे कि नीतीश कुमार को भाजपा ने हाईजैक कर लिया है.







