बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद पद की शपथ लेने के साथ केंद्र की राजनीति में अपना एक नया अध्याय शुरू कर चुके हैं। बिहार के 20 साल से मुख्यमंत्री पद पर आसीन जनता दल यूनाईटेड (जेडीयू) के नेता नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद की शपथ लेने के साथ विधायिका के सभी चार सदनों में भागीदारी करने वाले नेता भी बन गए हैं। यानी वे ऐसे नेता हैं जो विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा के साथ राज्यसभा सदस्य भी रहे। हालांकि नीतीश कुमार यहां भी थमने वाले नहीं हैं, अगले साल का इंतजार करें।
नीतीश कुमार भारत की राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं, राजनीति की हारती हुई बाजी भी ऐन वक्त पर अपने पक्ष में करने में माहिर हैं। वे हमेशा सधी हुई चाल चलते रहे हैं। वे ऐसे नेता हैं जिनके बारे में अनुमान अक्सर गलत ही साबित होते रहे हैं। उनके मन की थाह लेना असंभव बना रहा है। वे जो कहते हैं, अक्सर वैसा नहीं होता और जो वे चाहते हैं, वह कोई समझ नहीं सकता।
नीतीश कुमार राजनीति का 50 साल से अधिक लंबा सफर तय कर चुके हैं। यह सफर 1970 के दशक के साथ शुरू हुआ था जब वे इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थी थे। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन की चिंगारी ने युवा नीतीश को आंदोलनकारी बना दिया था। विद्यार्थी जीवन के बाद वे बिहार के बिजली विभाग में इंजीनियर के रूप में नौकरी करने लगे थे, हालांकि उन में व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की आग शांत नहीं हुई थी। जेपी का आंदोलन जब अपने चरम पर था तब नीतीश कुमार सरकारी नौकरी छोड़कर फिर से इस आंदोलन से जुड़ गए। जेपी के विद्यार्थी आंदोलन को केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने कुचला और 1975 में आपातकाल लागू कर दिया। इमरजेंसी लगाकर इंदिरा गांधी की सरकार ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी पटक ली और 1977 के चुनाव में लोकसभा चुनाव में उसे करारी शिकस्त मिली।
आपातकाल से शुरू हुआ राजनीति का सफर
केंद्र की इंदिरा सरकार की हार जेपी आंदोलन की सफलता थी और यही वह मोड़ था जहां से नीतीश कुमार की मुख्य धारा की राजनीति का सफर शुरू हुआ। उन्होंने सन 1977 में हरनौत सीट से पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था। उन्हें इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 1980 के चुनाव में भी उन्हें इसी सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा था। सन 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्हें पहली जीत हासिल हुई थी। तब वे लोक दल के प्रत्याशी के रूप में हरनौत सीट से जीते थे। दो चुनावों में पराजय की पीड़ा झेलने के बाद नीतीश कुमार ने तीसरा चुनाव जीता और फिर 1995 में भी जीते। हालांकि इसके बाद उन्होंने फिर कभी कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा।
लगातार लोकसभा के 6 चुनावों में विजय
नीतीश कुमार ने 1995 के बाद भले ही कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन वे लोकसभा के चुनाव लड़ते रहे। वे केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे। सन 1989 में उन्होंने बाढ़ सीट से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था। बाद में सन 1991, 1996, 1998 और 1999 में भी इसी सीट से जीत हासिल की। सन 2004 में उन्होंने बाढ़ और नालंदा दोनों सीटों से चुनाव लड़ा। वे नालंदा में तो जीत गए लेकिन बाढ़ में हार गए थे। सन 2004 का यह लोकसभा चुनाव वह चुनाव था जिसके बाद नीतीश ने कोई चुनाव नहीं लड़ा। हालांकि नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव हमेशा जीतते रहे। वे तीन विधानसभा चुनावों में से एक में जीते और छह लोकसभा चुनावों में सभी में जीते।
तीन बार केंद्रीय मंत्री
नीतीश कुमार सन 1989 में पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे। इसके करीब एक साल बाद ही वे सन 1990 में पहली बार केंद्रीय मंत्री बन गए थे। उन्हें कृषि राज्यमंत्री बनाया गया था। नीतीश 1998-99 में कुछ समय तक रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे थे। अगस्त 1999 मे एक रेल दुर्घटना होने पर उन्होंने मंत्री का पद त्याग दिया था। हालांकि बाद में उन्हें फिर से रेल मंत्री बनाया गया था।
बिहार के 10 बार मुख्यमंत्री
नीतीश कुमार पहली बार मार्च 2000 में मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें सात दिन बाद मुख्यमंत्री पद त्यागना पड़ा था। हालांकि जनता दल यूनाईटेड (JDU) के संस्थापक नीतीश सन 2005 में दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और फिर उन्हें कोई नहीं डिगा पाया। वर्ष 2014-15 में कुछ महीनों को छोड़कर वे लगातार मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे। उन्होंने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नीतीश सन 2006 में पहली बार विधान परिषद सदस्य बने थे। इसके बाद सन 2012, 2018 और फिर 2024 में चौथी बार विधान परिषद सदस्य बने। वे ऐसे बिहार के ऐसे नेता हैं जो 20 साल मुख्यमंत्री रहे, लेकिन कभी विधानसभा चुनाव के जरिए सदन में नहीं पहुंचे।
क्या अंतिम मंजिल राज्यसभा?
बिहार के 10 बार मुख्यमंत्री, छह बार सांसद, दो बार विधायक और चार बार विधान परिषद सदस्य रहे नीतीश कुमार अब चौथे सदन यानी संसद के उच्च सदन राज्यसभा में अपनी पारी शुरू कर चुके हैं। कुछ साल पहले नीतीश कुमार को राष्ट्रपति बनाए जाने की चर्चा चली थी। कहीं न कहीं इसके पीछे कुछ को कारण होगा कि उनका नाम राष्ट्रपति पद के लिए लिया जा रहा था। वैसे अगले साल मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। नीतीश कुमार की अंतिम मंजिल राज्यसभा ही है, या कहीं और आगे जाना है?







