सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक के फैसले ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है। कुछ डॉक्टरों में इस निर्णय को लेकर नाराजगी देखी जा रही है, वहीं कई चिकित्सकों और संगठनों ने इसे जनहित में जरूरी कदम बताया है। बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भाषा) के महासचिव डॉक्टर अमिताभ, डॉ. एमएम जाफरी और डॉ. अभिजीत ने संयुक्त बयान जारी कर सरकार के इस आदेश का स्वागत किया है।
उन्होंने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के प्रति आभार जताया है आैर कहा है कि यह फैसला आम जनता के हित में है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट मांग की है कि 25 प्रतिशत नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (एनपीए) और ग्रामीण भत्ता तत्काल लागू किया जाए, ताकि डॉक्टरों के हितों का संतुलन बना रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रैक्टिस पर रोक लगाने से पूरी समस्या हल नहीं होगी। कई सरकारी अस्पतालों में अभी भी दवाइयों, उपकरणों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है। यदि इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो डॉक्टरों की मौजूदगी बढ़ने के बावजूद मरीजों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।
चिकित्सकों से सहयोग की अपील की
जदयू नेता और नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुनील कुमार सिंह ने भी इस फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य के स्वास्थ्य ढांचे, उपकरण और मैनपावर में बड़ा सुधार हुआ है। उन्होंने डॉक्टरों से अपील की कि वे अस्पताल में निर्धारित समय तक नियमित रूप से उपस्थित रहें, ताकि मरीजों को बेहतर सुविधा मिल सके। कहा कि एनपीए लेने के बावजूद निजी प्रैक्टिस करना आर्थिक अपराध है। ऐसे मामलों की जांच ईओयू से कराई जानी चाहिए।
- सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी।
- मरीजों को निजी क्लीनिक के बजाय सरकारी संस्थानों में ही इलाज मिल सकेगा।
- रेफरल और कमीशन आधारित प्रैक्टिस पर अंकुश लगेगा।
- गरीब और ग्रामीण मरीजों को सीधा फायदा मिलेगा।
डॉक्टरों की चिंता
- निजी प्रैक्टिस बंद होने से अतिरिक्त आय खत्म हो जाएगी।
- 25 प्रतिशत एनपीए और ग्रामीण भत्ता अभी तक लागू नहीं।
- कई अस्पतालों में संसाधनों और स्टाफ की कमी।
- कार्यभार बढ़ने से पेशेवर दबाव में इजाफा होगा।







