अपनी ताकत बढ़ाने के बावजूद भाजपा अपने प्रमुख सहयोगी नीतीश कुमार को नाराज करने से बचेगी. जेडीयू का साथ छोड़ने की भूल शायद ही करे. इसकी 2 वजहें हैं. केंद्र में सरकार बनाए रखने के लिए जेडीयू के 12 सांसदों के समर्थन की भाजपा को सख्त जरूरत है. नीतीश कुमार एनडीए के सबसे पुराने साथी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा करने से भाजपा बिल्कुल बचेगी. भाजपा सरकार में जेडीयू को उसी तरह तरजीह देती रहेगी, जैसा अब तक दिया है. मसलन मंत्री और उप मुख्यमंत्री का पैटर्न यथावत रहेगा. नीतीश की नीतियां खारिज नहीं की जा सकतीं. उन पर ही भाजपा के सीएम काम करते रहेंगे. इससे भाजपा के ताकतवर होने के बावजूद जेडीयू का रुतबा बरकरार रहेगा.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
भाजपा को जेडीयू के 16-17 प्रतिशत वोटों की अहमियत का एहसास है. इसमें 10-11 प्रतिशत वोट तो नीतीश के लव-कुश समीकरण वाले ही हैं. भाजपा के पास लव-कुश समीकरण के वोटों को अपने पाले में करने के लिए कुशवाहा नेता सम्राट चौधरी हैं, जिन्हें पार्टी ने समय-समय पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपने के बाद अब सीएम बना दिया है। पर, यह भी सच है कि लव यानी कुर्मी जाति में वे नीतीश कुमार के तरह स्वीकार्य नहीं हैं. कुर्मी समाज तो इससे ही दुखी हैं कि उनकी जाति के नीतीश कुमार सीएम नहीं रहे। नीतीश कुमार के बेटे निशांत तक वे मानने को तैयार थे. उन्हें ही नीतीश की जगह सीएम बनाने की मांग वे इसीलिए कर रहे थे. पर, नीतीश ने उन्हें न सीएम बनने दिया और डेप्युटी सीएम ही बनाया.
आरजेडी में टूट की आशंका इसलिए बलवती दिखती है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ ऐसा हो चुका है. 7 सांसदों का टूट कर भाजपा में जाना सामान्य घटना नहीं है. अब तो आप (AAP) के विधायकों के टूटने के भी दावे किए जा रहे हैं. जहां तक बिहार में राजद का सवाल है तो पहले ही उसे इसका संकेत मिल चुका है. राज्यसभा चुनाव में राजद के एक विधायक ने एनडीए का साथ दिया। वह भी उस बिरादरी के विधायक ने राजद को धोखा दिया, जिस पर राजद अपने पेटेंट का दावा करता रहा है. यानी मुस्लिम विधायक से ही धोखा. राजद विधायक तेजस्वी यादव को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी इतनी प्यारी है कि उसके जाने के भय से वे उस विधायक को शो काज नोटिस तक नहीं दे पाए. इसी भय से सम्राट चौधरी के विश्वासमत के दौरान पक्ष-विपक्ष के विधायकों की गिनती कराने की जरूरत भी उन्होंने नहीं समझी.

राजद नेता तेजस्वी यादव की फोटो
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के 3 विधायकों ने एनडीए का साथ दिया. तब से ही बिहार में कांग्रेस पर तलवार लटक रही है. शुक्रवार को चनपटिया के विधायक अभिषेक रंजन ने सम्राट चौधरी से उनके आवास पर मुलाकात की थी. शनिवार को कांग्रेस के ही एमएलसी समीर कुमार सिंह भी सम्राट से मिले. कांग्रेस के कुल जमा 6 विधायक हैं. 3 तो पहले ही बागी हो चुके हैं. चर्चा है कि कांग्रेस के सभी विधायक एनडीए के किसी न किसी घटक दल से सटना चाहते हैं. चूंकि सम्राट चौधरी अब सीएम हैं, इसलिए उनकी ओर कांग्रेस विधायकों का मुखातिब होना स्वाभाविक है.
भाजपा या कोई भी पार्टी अपनी ताकत बढ़ाती है तो इसमें हर्ज ही क्या है. हाल ही में नीतीश कुमार ने जेडीयू विधायकों को अगली बार जेडीयू को कुल 243 में 200 पार सीटों का लक्ष्य दिया है. ऐसे में भाजपा भी अपने को मजबूत करने का प्रयास करें तो इसे एनडीए में खटपट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. हां, एक संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. वह यह कि ऐसा होने पर उस ‘खेल’ का खतरा खत्म हो जाएगा, जिसकी उम्मीद 41 विधायकों वाला विपक्ष इस बुरी हालत में भी पाले हुए हैं.







