कांग्रेस को चुभ गई राजद की सियासी चाल !…………………..

राजद ने बांकीपुर उपचुनाव में रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बना कर कांग्रेस के जले पर नमक छिड़का है। राजद की यह चाल कांग्रेस को बुरी तरह चुभ रही है। रेखा गुप्ता पहले कांग्रेस में ही थीं। 2025 में जिस नाटकीय घटनाक्रम के बाद वे राजद में गयीं थीं उसकी एक दिलचस्प कहानी है। इस कहानी […]

UB India News By UB India News Patna, Bihar
गुरुवार, 9 जुलाई 2026, 05:53 AM 10 मिनट read
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कांग्रेस को चुभ गई राजद की सियासी चाल !…………………..
Photo: UB India News Archive

राजद ने बांकीपुर उपचुनाव में रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बना कर कांग्रेस के जले पर नमक छिड़का है। राजद की यह चाल कांग्रेस को बुरी तरह चुभ रही है। रेखा गुप्ता पहले कांग्रेस में ही थीं। 2025 में जिस नाटकीय घटनाक्रम के बाद वे राजद में गयीं थीं उसकी एक दिलचस्प कहानी है। इस कहानी का असर अब 2026 के उप चुनाव पर पड़ने की आशंका जतायी जा रही है।

आरजेडी ने कांग्रेस की रेखा गुप्ता को तोड़ लिया था

कहा जाता है कि जब 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद के बांकीपुर सीट के लिए कोई मजबूत उम्मीदवार नहीं मिल रहा था तब उसने कांग्रेस की रेखा गुप्ता को तोड़ कर अपनी पार्टी में बुला लिया था। रेखा गुप्ता ने राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे बड़े मतों के अंतर से हार गयी थीं। 2026 के उपचुनाव में कांग्रेस बांकीपुर से अपना उम्मीदवार उतारना चाहती थी।

उसने तर्क दिया कि राजद को 2025 में कोई मजबूत उम्मीदवार नहीं मिला था, इसलिए उसने कांग्रेस के बौरो प्लेयर को मैदान में उतरा था। कांग्रेस ने यह भी तर्क दिया कि पटना शहर में उसका, राजद की अपेक्षा ज्यादा जनाधार है, इसलिए ये सीट उसके खाते में आनी चाहिए। लेकिन राजद ने कांग्रेस को न पहले कुछ समझा था न अब समझा। रेखा गुप्ता को राजद का मुकम्मल नेता बना पर टिकट सौंप दिया।

2025 में रेखा गुप्ता की कांग्रेस से राजद में पैराशूट लैंडिंग

2025 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में घात-प्रतिघात और दांव-पेंच चरम पर था। सीट बंटवारे को लेकर राजद और कांग्रेस, आपस में ही लाठी भांज रहे थे। बांकीपुर सीट पर आखिरी समय तक फैसला नहीं हो सकता था। राय-विचार में यह सीट कांग्रेस की मानी जा रही थी। कांग्रेस ने अपने दल की सक्रिय कार्यकर्ता रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाने की मंजूरी भी दे दी थी। बस औपचारिक घोषणा बाकी थी। रेखा गुप्ता ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

शाम को आनन-फानन में नामांकन

पहले चरण के चुनाव के लिए 17 अक्टूबर 2025, नामांकन की आखिरी तारीख थी। 17 अक्टूबर की सुबह तक रेखा गुप्ता कांग्रेस से नामजदगी का पर्चा दाखिल करने की तैयारी कर रही थीं। इस बीच सीट शेयरिंग के तहत बांकीपुर सीट कांग्रेस से लेकर राजद के कोटे में डाल दी गयी। इसके बाद हचल मच गयी। दोपहर को रेखा गुप्ता ने अचानक कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। कुछ देर बाद वे राजद में शामिल हो गयीं। दिन ढलने लगा था और नामांकन का समय लगभग खत्म होने के करीब था। रेखा गुप्ता राजद का सिम्बल लेकर आनन-फानन में निर्वाची अधिकारी के ऑफिस पहुंचीं और नामांकन का पर्चा दाखिल किया। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने उन्हें अपने तत्कालीन आवास 10, सर्कुलर रोड बुला कर खुद सिम्बल दिया था। सिर्फ चार घंटे में ही रेखा गुप्ता की पहचान बदल गयी। वे कांग्रेस की बजाय राजद के नेता बन गयीं।

क्या कांग्रेस के नाराज कार्यकर्ता रेखा गुप्ता को समर्थन देंगे?

राजद ने भाजपा के वैश्य वोटरों को तोड़ने के लिए रेखा गुप्ता को कांग्रेस से राजद में एंट्री दिलायी थी। रेखा गुप्ता वैश्य समुदाय से हैं। लेकिन राजद के सारे दांव-पेंच फेल हो गये थे। बांकीपुर के वोटरों ने मुकाबले को एकतरफा बना दिया। भाजपा के नितिन नवीन ने राजद की रेखा गुप्ताको करीब 52 हजार वोटों से चुनाव हरा दिया। अब वही रेखा गुप्ता 2026 में भाजपा के अभिषेक को चुनौती देने फिर से मैदान में हैं।

तेजस्वी ने यह जल्दबाजी क्यों की? क्या बीजेपी को हराना उनके एजेंडे में नहीं है? विधानसभा में पीके के जाने से तेजस्वी को क्या डर है?

तेजस्वी यूरोप में… फिर भी टिकट घोषित करने की इतनी जल्दी क्यों?

बांकीपुर उपचुनाव में ससबे बड़ी बात उम्मीदवारों का ऐलान नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग है। जब चर्चा तेज हुई कि अगर महागठबंधन प्रशांत किशोर का समर्थन कर दे तो बीजेपी को कठिन मुकाबला मिल सकता है। इसी दौरान छुट्टी मनाने यूरोप गए तेजस्वी यादव ने आरजेडी की ओर से रेखा गुप्ता के नाम का ऐलान कर दिया।

  • इसके खिलाफ कांग्रेसी नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी ने कार्यक्रम रद्द किया। प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा कि बिना बातचीत कोई दल गठबंधन का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसके बाद कांग्रेस के भी उम्मीदवार उतारने की चर्चा शुरू हो गई।
  • विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव किसी भी कीमत पर यह संदेश नहीं जाने देना चाहते थे कि प्रशांत किशोर विपक्ष का स्वाभाविक उम्मीदवार हो सकते हैं। यदि बातचीत लंबी चलती तो महागठबंधन के भीतर पीके के समर्थन की मांग और तेज हो सकती थी।
  • 2025 में भी आरजेडी ने यहां रेखा गुप्ता को टिकट दिया था, लेकिन वह हार गई थीं। इसलिए पार्टी के पास यह तर्क था कि पुराना उम्मीदवार दोबारा उतारा गया है।

बीजेपी से ज्यादा पीके को रोकना क्यों जरूरी समझ रहे तेजस्वी?

बांकीपुर का उपचुनाव सरकार बदलने वाला नहीं है। इसके बावजूद यह सीट पूरे बिहार की राजनीति का केंद्र बनी हुई है। कारण, प्रशांत किशोर हैं। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव है।

  • यदि वह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट जीत जाते हैं तो बिहार की राजनीति में उनका कद अचानक बढ़ जाएगा।
  • ऐसे में प्रशांत विपक्ष के लिए भी एक वैकल्पिक नेतृत्व का दावा मजबूत करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव ऐसा नहीं होने देना चाहते।
  • माना जा रहा है कि इसी वजह से आरजेडी ने पीके को विपक्ष का साझा उम्मीदवार बनने का मौका नहीं दिया। अगर महागठबंधन उनका समर्थन करता तो जीत की संभावना बढ़ सकती थी।
  • राजनीति में कई बार चुनाव सीट से बड़ा संदेश देता है। बांकीपुर का चुनाव भी उसी श्रेणी में रखा जा रहा है। इसलिए यह लड़ाई सिर्फ बीजेपी बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि विपक्ष के नेतृत्व की भी बन गई है।

क्या तेजस्वी को डर है कि विधानसभा में पीके विपक्ष का चेहरा बन जाएंगे?

प्रशांत किशोर पिछले तीन वर्षों से बिहार में लगातार पदयात्रा और जनसंवाद कर रहे हैं। जनता के बीच जाकर शिक्षा, पलायन, रोजगार और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दे उठा रहे हैं। दूसरी ओर तेजस्वी यादव का सबसे मजबूत राजनीतिक अभियान नौकरी और रोजगार का रहा है।

  • अगर प्रशांत किशोर विधानसभा पहुंचते हैं तो दोनों नेताओं के बीच स्वाभाविक रूप से तुलना होगी। पीके को विधानसभा के भीतर सवाल पूछने, नीति पर बहस करने और सरकार को घेरने का नया मंच मिलेगा।
  • राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक शैली तथ्यों, आंकड़ों और प्रस्तुति पर आधारित रही है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनका लंबा अनुभव भी उनकी पहचान का हिस्सा है।
  • आरजेडी नहीं चाहेगी कि विपक्ष के भीतर ऐसा दूसरा चेहरा खड़ा हो जाए जिसे मीडिया और जनता तेजस्वी के विकल्प के रूप में देखने लगे।
  • इसलिए बांकीपुर की लड़ाई को सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं बल्कि भविष्य के विपक्षी नेतृत्व की लड़ाई भी माना जा रहा है।

जातीय गणित में दो सवर्ण उम्मीदवार, क्या इसी समीकरण पर खेल रहे तेजस्वी?

बांकीपुर विधानसभा सीट सवर्ण बहुल मानी जाती है। यहां कायस्थ, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत मतदाताओं की बड़ी संख्या है।

  • बीजेपी ने कायस्थ समाज से आने वाले अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है। दूसरी तरफ प्रशांत किशोर ब्राह्मण समाज से आते हैं। यदि दोनों के बीच सवर्ण वोटों का बंटवारा होता है तो तीसरे उम्मीदवार को फायदा मिल सकता है।
  • आरजेडी ने रेखा गुप्ता को मैदान में उतारकर इसी संभावना पर दांव लगाया है। पार्टी को उम्मीद है कि उसका पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार वोट सुरक्षित रहेगा। अगर सवर्ण वोटर बंटते हैं तो मुकाबला त्रिकोणीय बन जाएगा।
  • यानी यह रणनीति सिर्फ पीके को रोकने की नहीं, बल्कि बीजेपी और जन सुराज दोनों को एक साथ नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी मानी जा रही है।

5. महागठबंधन में बढ़ी दरार, कांग्रेस की नाराजगी क्या संकेत देती है?

रेखा गुप्ता के नाम की घोषणा के बाद प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने साफ कहा कि बिना बातचीत कोई दल गठबंधन का हिस्सा नहीं हो सकता। इसके बाद कांग्रेस के उम्मीदवार उतारने की चर्चा भी शुरू हो गई।

  • राजनीतिक तौर पर यह संकेत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिहार में महागठबंधन की मजबूती हमेशा सीटों के सामंजस्य पर टिकी रही है।
  • अगर सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से असहमति जताने लगें तो विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठते हैं।
  • कांग्रेस अलग रास्ता चुनती है तो इसका सीधा असर विपक्षी वोटों के बिखराव पर पड़ सकता है।

पप्पू से कन्हैया तक… क्या तेजस्वी युवाओं को आगे नहीं आने देते?

बिहार की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कई युवा नेताओं का उभार हुआ है। लोकसभा चुनाव में पूर्णिया से पप्पू यादव को रोकने के लिए आरजेडी ने बीमा भारती को मैदान में उतारा, लेकिन पप्पू यादव निर्दलीय चुनाव जीत गए।

  • 2019 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से कन्हैया कुमार के खिलाफ भी आरजेडी ने उम्मीदवार उतारा था।
  • प्रशांत किशोर को लेकर भी तेजस्वी यादव लगातार सवाल उठाते रहे हैं। जन सुराज को बीजेपी की ‘बी टीम’ बताते रहे हैं। उनकी फंडिंग को लेकर सवाल किए हैं।
  • राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरजेडी अपने राजनीतिक स्पेस में किसी दूसरे युवा चेहरे को मजबूत नहीं होने देना चाहती।

अगर पीके जीत गए तो सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा?

बांकीपुर उपचुनाव का राजनीतिक असर जीत-हार के बाद तक दिखाई दे सकता है। अगर प्रशांत किशोर बीजेपी उम्मीदवार को हराने में सफल होते हैं तो यह उनकी पहली चुनावी जीत होगी और जन सुराज को मजबूती मिलेगी।

  • ऐसी स्थिति में 2027 के विधानसभा चुनाव (या अगले बड़े चुनाव) से पहले वे खुद को बिहार में तीसरे विकल्प नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेंगे।
  • इसका सबसे बड़ा असर आरजेडी पर पड़ सकता है, क्योंकि विपक्ष के वोट और नेतृत्व दोनों पर नई चुनौती खड़ी होगी। इसी वजह से तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव सिर्फ बीजेपी को हराने का सवाल नहीं, बल्कि विपक्ष के नेतृत्व को अपने हाथ में बनाए रखने की भी लड़ाई है।

पीके का ग्राउंड कनेक्ट तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी चुनौती?

तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। जनता को उम्मीद रहती है कि वे उनकी आवाज उठाएंगे, लेकिन कई बड़े मौकों पर तेजस्वी यादव ग्राउंड जीरो पर नहीं पहुंचे। जैसे भरत तिवारी एनकाउंटर और नीट छात्रा मौत मामला।

  • दूसरी ओर प्रशांत ऐसी पार्टी के नेता हैं, जिसके पास एक भी विधायक नहीं है। इसके बाद भी वह बड़ी घटनाओं के बाद ग्राउंड जीरो पर पहुंचते हैं।
  • भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर मामला सामने आया तो प्रशांत किशोर पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। न्यायिक जांच की मांग उठाई। राज्य सरकार के खिलाफ सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जांच केवल जिला पुलिस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि शीर्ष अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
  • नीट छात्रा रेप-मौत केस में भी प्रशांत किशोर पीड़ित परिवार के घर पहुंचे थे। उन्होंने न्याय की मांग का समर्थन किया था। नालंदा में दो दलित युवकों की हत्या हुई तो वह पीड़ित परिवार के पास गए। कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमला बोला।
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