“देखिए साहब… गुस्सा बहुत है, लेकिन वोट डालने की बारी आती है तो जाति, संगठन और पुराना भरोसा काम करता है। प्रशांत किशोर ने पहली बार भाजपा का पसीना जरूर छुड़ाया है, लेकिन भाजपा का बूथ और कैडर अभी भी बहुत मजबूत है।”
हार्डिंग रोड पर चाय की दुकान पर बैठे एक बुजुर्ग की यह बात बांकीपुर उपचुनाव का पूरा चुनावी गणित समझा देती है। छात्र आंदोलन के बाद माहौल बदला है, लेकिन जीत का रास्ता अब भी संगठन, जातीय समीकरण और मतदान प्रतिशत तय करेगा।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है। BJP के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की प्रतिष्ठा का सवाल है। वहीं, जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर के लिए यह उनकी राजनीति की पहली बड़ी परीक्षा। राजद इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में है।
बांकीपुर का माहौल कैसा है…? ये जानने के लिए मतदान से पहले बाजार, चाय की दुकानों और स्थानीय लोगों से बात की। यहां चुनावी मुद्दे क्या हैं? छात्र आंदोलन का क्या असर है? पीके बीजेपी को कैसे टक्कर दे रहे हैं, तेजस्वी के गायब रहने का असर क्या है? ओवरऑल चुनाव किस तरफ जाता दिखाई दे रहा है।
1. भाजपा को लेकर क्या सोच रहे हैं लोग?
भाजपा के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क उसके संगठन और पिछले वर्षों में हुए विकास कार्यों को लेकर दिखाई देता है। सिपारा निवासी राजकुमार केसरी कहते हैं, “25 साल से खराब सड़क थी, नितिन नवीन ने बनवा दी। बिजली, पानी और पुल के काम हुए हैं। प्रत्याशी कोई भी हो, संगठन काम करता है। भाजपा का कैडर बहुत मजबूत है। जातीय समीकरण और कैडर वोट नहीं बिखरा तो BJP सीट निकालेगी।”
रविंद्र कुमार कहते हैं, “पूरा माहौल नीरज कुमार सिन्हा के पक्ष में दिख रहा है। जब सब उसी को वोट दे रहे हैं तो बदलाव की जरूरत क्या है?”
स्थानीय निवासी प्रदीप मानते हैं कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका स्थानीय नेतृत्व है। वे कहते हैं, “नितिन नवीन लोगों के बीच आते थे। प्रशांत किशोर बाहर से आए हैं, चुनाव खत्म होगा तो चले जाएंगे, लेकिन भाजपा का विधायक यहीं रहेगा।”
भाजपा समर्थकों के बीच एक और बात बार-बार सुनाई देती है कि बांकीपुर में पार्टी का बूथ नेटवर्क इतना मजबूत है कि कम मतदान होने पर भी उसे फायदा मिलता है। कई कार्यकर्ताओं का दावा है कि हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता और शक्ति केंद्रों का नेटवर्क चुनाव वाले दिन समर्थक मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
हालांकि भाजपा समर्थकों के बीच भी महंगाई को लेकर नाराजगी दिखती है। लेकिन उनका तर्क है कि राष्ट्रीय मुद्दों की तुलना में स्थानीय विकास अधिक महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि नाराजगी होने के बावजूद वे भाजपा से पूरी तरह दूर नहीं हुए हैं।
क्या है भाजपा की ताकत?
1. बूथ मैनेजमेंट और मजबूत कैडर
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन है। 60 शक्ति केंद्र, बूथ अध्यक्ष, बीएलए-2, 50 से अधिक विधायक-एमएलसी और आरएसएस नेटवर्क चुनाव के दिन समर्थक वोटरों को बूथ तक पहुंचाने में जुटा है। कम मतदान वाले शहरी चुनाव में यही संगठनात्मक बढ़त भाजपा को सबसे बड़ा फायदा दिला सकती है।
2. सवर्ण, कायस्थ और वैश्य वोट बैंक का मजबूत आधार
बांकीपुर में कायस्थ, भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य मिलाकर लगभग आधे मतदाता हैं। पिछले तीन दशकों से यह वर्ग भाजपा का मुख्य आधार रहा है। उम्मीदवार बदलने के बावजूद इन वर्गों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ बना हुआ दिख रहा है, जिससे पार्टी की चुनावी स्थिति मजबूत बनी हुई है। लव-कुश वोट का एक हिस्सा एनडीए के साथ रहने की संभावना है।
3. नितिन नवीन के विकास कार्य और स्थानीय नेटवर्क
भाजपा का प्रचार पूरी तरह नितिन नवीन के कामकाज पर आधारित है। सड़क, पुल, बिजली और स्थानीय संपर्क को लेकर समर्थक खुलकर उनके पक्ष में बोल रहे हैं। नितिन नवीन का व्यक्तिगत नेटवर्क, पुराने कार्यकर्ता और मोहल्ला स्तर का संपर्क भाजपा को स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त बढ़त देता दिखाई दे रहा है।
4. कम वोटिंग प्रतिशत भाजपा के लिए अनुकूल समीकरण
बांकीपुर में परंपरागत रूप से मतदान प्रतिशत कम रहता है। ऐसे चुनावों में संगठित कैडर वाली पार्टी को फायदा मिलता है। भाजपा की पूरी रणनीति अपने समर्थकों को हर हाल में मतदान केंद्र तक पहुंचाने की है।
5. जमीन पर भाजपा की मजबूत पकड़
बांकीपुर पूरी तरह से पटना नगर निगम के शहरी वार्डों (जैसे- वार्ड 4, 5, 7 से 13 और 15) वाली सीट है। यहां मिडिल क्लास, व्यापारी और पढ़े लिखे लोगों (जैसे-सरकारी कर्मचारी, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर) की संख्या ज्यादा है।
शहरी एरिया होने के कारण भाजपा की पकड़ बहुत मजबूत है। यहां के वोटर कानून-व्यवस्था, राष्ट्रवाद, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास के मुद्दों पर वोट करते हैं, जो भाजपा की पिच के अनुकूल बैठता है।
क्या है भाजपा की कमजोरी?
छात्र आंदोलन: दिल्ली और पटना में पेपर लीक को लेकर छात्रों ने आंदोलन किया। इसके चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस की लाठीचार्ज की घटना से युवाओं के अंदर नाराजगी है। प्रशांत किशोर की युवाओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता से भाजपा से यह वोट बैंक खिसक सकता है।
गुटबाजी: प्रशांत किशोर के सामने भाजपा प्रत्याशी नीरज सिन्हा थोड़े नर्वस नजर आ रहे हैं। भाजपा के अंदरखाने एक गुट निष्क्रिय हो गया है। वह प्रचार से दूर है। डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा ने प्रदेशभर से करीब 6,000 कार्यकर्ताओं को डोर-टू-डोर कैंपेन करने का जिम्मा दिया है।
महंगाई, बेरोजगारी और एंटी-इनकंबेंसी: ग्राउंड पर बातचीत में महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक और हालिया छात्र आंदोलन को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी साफ दिखी। खासकर युवा और मध्यम वर्ग के मतदाता इन मुद्दों पर भाजपा से सवाल पूछ रहे हैं। यदि यह नाराजगी मतदान में बदलती है, तो भाजपा के पारंपरिक वोट शेयर पर असर पड़ सकता है।
उम्मीदवार बदलने से हुआ विवाद: पहले घोषित प्रत्याशी का नाम वापस लेकर नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाने के फैसले ने भाजपा को शुरुआती दिनों में रक्षात्मक स्थिति में ला दिया।
जन सुराज और राजद ने इसे पार्टी के भीतर असमंजस और दबाव का संकेत बताते हुए चुनावी मुद्दा बनाया। हालांकि संगठन ने बाद में स्थिति संभाल ली, लेकिन इस विवाद ने विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का अवसर दिया।
2. प्रशांत किशोर को लेकर क्या सोच रहे हैं लोग?
प्रशांत किशोर को लेकर बांकीपुर में दो तरह की राय साफ दिखाई देती है। पहला वर्ग उन्हें बदलाव का प्रतीक मान रहा है, जबकि दूसरा उन्हें सिर्फ चुनावी रणनीतिकार मानकर संदेह की नजर से देख रहा है।

निरंजन कुमार का कहना है, “कम से कम इस बार भाजपा का घमंड टूटना चाहिए। पहले कहा जाता था कि यहां किसी को भी टिकट दे देंगे तो जीत जाएगा। जनता को बताना चाहिए कि वोट उसी का है।”
मिठाई दुकानदार धीरज कुमार महंगाई को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा मानते हैं। वे कहते हैं, “नेता पहले अपनी जेब भरता है, फिर जनता की सोचता है। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि गरीब आदमी का खाना मुश्किल हो गया है। बदलाव की जरूरत है।”
वहीं नरेश कुमार प्रशांत किशोर को नया विकल्प तो मानते हैं, लेकिन उनकी जीत को जातीय समीकरण से जोड़ते हैं। वे कहते हैं, “अगर लोग जाति से ऊपर उठकर वोट दें तो प्रशांत किशोर सबसे मजबूत विकल्प हैं, लेकिन बांकीपुर में जाति अब भी सबसे बड़ा फैक्टर है।”
दूसरी तरफ भाजपा समर्थक प्रशांत किशोर को लेकर संशय जताते हैं। राजकुमार केसरी कहते हैं, “वे नौजवानों को भड़काते हैं। चुनाव लड़ना और सरकार चलाना दो अलग बातें हैं।”
सिद्धार्थ नागार्जुन भी कहते हैं कि प्रशांत किशोर ने चुनाव को रोचक जरूर बनाया है, लेकिन उनकी असली परीक्षा पहली बार मैदान में उतरने के बाद होगी।
प्रशांत किशोर ने भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने की कोशिश की है, लेकिन यह समर्थन पूरी तरह वोट में बदलेगा या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल है।
क्या है प्रशांत किशोर की ताकत?
छात्र आंदोलन: छात्र आंदोलन के बाद सरकार विरोधी माहौल का लाभ जन सुराज को मिला। बेरोजगारी और पेपर लीक मुद्दा उठाया। इससे प्रतियोगी छात्रों, पहली बार वोट डालने वाले युवाओं और शिक्षित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है।
मजबूत चेहरा: भाजपा के उम्मीदवार बदलने के विवाद ने जन सुराज को चुनावी मुद्दा दिया। प्रशांत किशोर खुद को भाजपा और राजद दोनों के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। जनता के बीच कहते हैं, ‘अन्याय होगा तो विधानसभा से दिल्ली तक आवाज उठाऊंगा। मुझसे बेहतर कोई उम्मीदवार है तो उसे वोट दे दीजिए।’
बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और स्थानीय समस्याओं को लेकर वे लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। बदलाव चाहने वाले मतदाताओं के बीच उनकी छवि एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में बनती दिखाई दे रही है।
शिक्षित शहरी और असंतुष्ट सवर्ण मतदाताओं में पैठ: बांकीपुर का बड़ा हिस्सा शिक्षित शहरी मतदाताओं का है। इनमें भाजपा से नाराज लेकिन राजद से दूरी रखने वाला एक वर्ग प्रशांत किशोर की ओर आकर्षित दिख रहा है। छात्र आंदोलन के बाद सवर्ण समाज के कुछ युवाओं और पेशेवर वर्ग में भी उनके समर्थन की चर्चा बढ़ी है।
मुस्लिम वोट और भाजपा विरोधी मतों पर नजर: भाजपा विरोधी मतदाताओं के बीच प्रशांत किशोर ने सक्रिय अभियान चलाया है। यदि मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा और भाजपा विरोधी शहरी मतदाता उनके पक्ष में एकजुट होते हैं तो वे मुकाबले को बेहद करीबी बना सकते हैं। हालांकि इस वोट बैंक पर राजद भी मजबूत दावेदारी कर रहा है।

प्रशांत किशोर की 2 बड़ी कमजोरियां
1. मजबूत संगठन और बूथ कैडर की कमी
प्रशांत किशोर ने चुनावी माहौल जरूर बनाया है, लेकिन जन सुराज का संगठन अभी भाजपा जितना मजबूत नहीं माना जाता। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की संख्या, मतदान वाले दिन वोटरों को बूथ तक लाने की क्षमता और वर्षों से सक्रिय कैडर नेटवर्क की कमी उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। शहरी सीटों पर यह कमजोरी निर्णायक साबित हो सकती है।
2. समर्थन दिख रहा, लेकिन वोट में बदलना सबसे बड़ी परीक्षा
प्रशांत किशोर के पक्ष में युवाओं, शिक्षित वर्ग और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं के बीच चर्चा जरूर है, लेकिन पहली बार चुनाव लड़ रहे नेता के रूप में सबसे बड़ी चुनौती इस समर्थन को वास्तविक वोट में बदलने की है। साथ ही जातीय ध्रुवीकरण वाले चुनाव में गैर-पारंपरिक वोटों को एकजुट रखना भी उनके लिए आसान नहीं माना जा रहा है।
3. प्रचार में पीछे दिख रहीं थी रेखा गुप्ता, तेजस्वी के रोड शो से मिली ताकत
बांकीपुर में राजद उम्मीदवार रेखा गुप्ता नामांकन के दिन से ही चुनाव प्रचार में भाजपा और जन सुराज के प्रत्याशी की तुलना में पीछे नजर आईं। राजद नेता तेजस्वी यादव विदेश दौरे पर थे। छात्र आंदोलन के दौरान भी जनता के बीच नहीं दिखे। 20 से 24 जुलाई तक विधानसभा के मानसून सत्र में नजर नहीं आए।
तेजस्वी के नहीं रहने से रेखा गुप्ता के चुनाव प्रचार अभियान पर असर पड़ा। पार्टी के सीनियर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक का उम्मीद के अनुसार समर्थन नहीं मिला।
तेजस्वी रविवार को पटना लौटे और चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली है। सोमवार को मीठापुर प्रधान कार्यालय से चिरैयाटांड़ पुल होते हुए सब्जीबाग चौराहा तक 4 किलोमीटर लंबा रोड शो किया। इस रोड शो में भारी भीड़ जुटी। इससे रेखा गुप्ता के चुनाव प्रचार में जान आई है। 30 जुलाई को मतदान होने वाला है। ऐसे में तेजस्वी के पास अब चुनाव प्रचार के लिए चंद घंटे ही बचे हैं।

क्या है राजद की ताकत?
1- यादव वोटर्स एक साथ गिरे तो
बांकीपुर में यादव मतदाता निर्णायक संख्या में हैं। यह वर्ग परंपरागत रूप से राजद का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक माना जाता है। यदि यादव मत पूरी तरह एकजुट रहता है तो राजद मुकाबले में प्रभाव बनाए रख सकती है और भाजपा विरोधी वोटों में अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित रख सकती है।
2. मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण की संभावना
राजद की सबसे बड़ी उम्मीद उसका पारंपरिक मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण है। यदि मुस्लिम मतदाता जन सुराज की बजाय राजद के साथ अधिक मजबूती से खड़े होते हैं तो पार्टी का वोट शेयर अपेक्षा से बेहतर हो सकता है और त्रिकोणीय मुकाबले में उसकी भूमिका निर्णायक बन सकती है।
3. साइलेंट वोट की चर्चा जमीन पर मौजूद
ग्राउंड पर बातचीत के दौरान कई मतदाताओं ने कहा कि राजद का समर्थन खुलकर दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन उसका एक “साइलेंट वोट” मौजूद है। खासकर पुराने समर्थक, पारंपरिक परिवार और कुछ पिछड़े वर्ग चुनाव के दिन राजद के पक्ष में मतदान कर सकते हैं।
4. त्रिकोणीय मुकाबले का संभावित लाभ
यदि भाजपा और जन सुराज के बीच सीधी टक्कर में वोटों का ध्रुवीकरण होता है तो राजद अपने स्थायी वोट बैंक के सहारे सम्मानजनक प्रदर्शन कर सकती है। ऐसे में उसका वोट प्रतिशत मुकाबले को त्रिकोणीय बनाए रखने और दूसरे उम्मीदवारों के समीकरण प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
राजद की 4 बड़ी कमजोरियां
1. प्रचार अभियान सबसे कमजोर, शीर्ष नेतृत्व देर से सक्रिय
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा और जन सुराज ने शुरुआत से आक्रामक प्रचार किया, जबकि राजद का अभियान काफी धीमा रहा। तेजस्वी यादव के विदेश दौरे के कारण शुरुआती दौर में स्थानीय प्रत्याशी रेखा कुमारी गुप्ता लगभग अकेले प्रचार करती रहीं। इससे चुनावी नैरेटिव बनाने में राजद पीछे रह गई।
2. चुनाव भाजपा बनाम प्रशांत किशोर बनता गया
चुनाव भाजपा और प्रशांत किशोर की सीधी लड़ाई बन गई। मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया और ग्राउंड चर्चा में भी यही मुकाबला हावी रहा। इसका सबसे बड़ा नुकसान राजद को हुआ, वह तीसरे खिलाड़ी की भूमिका में सिमटती दिखाई दी।
3. शहरी सीट पर सीमित संगठन और कैडर
बांकीपुर पूरी तरह शहरी विधानसभा है, जहां बूथ मैनेजमेंट और कैडर नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा की तुलना में राजद का संगठन यहां कमजोर माना जाता है। जनसंपर्क, बूथ प्रबंधन और मतदान वाले दिन वोटर को बूथ तक ले जाने में भी राजद पिछड़ती दिख रही है।
4. MY समीकरण में सेंध की चुनौती
राजद की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक रहा है, लेकिन इस बार भाजपा विरोधी वोटों का एक हिस्सा प्रशांत किशोर की ओर आकर्षित होता दिख रहा है। यदि मुस्लिम और युवा यादव मतदाताओं में वोट बंटता है, तो इसका सीधा नुकसान राजद को हो सकता है।
क्या हैं बांकीपुर उपचुनाव के मुद्दे?
- महंगाई: रसोई गैस, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के खर्च बढ़ने से मध्यम वर्ग और गरीब दोनों परेशान हैं। बातचीत में सबसे ज्यादा बार यही मुद्दा सामने आया।
- बेरोजगारी: युवाओं का कहना है कि नौकरी के अवसर कम हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में देरी ने नाराजगी बढ़ाई है।
- छात्र आंदोलन: हालिया छात्र आंदोलन के बाद पहली बार युवा मतदाता खुलकर सरकार के खिलाफ चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं।
- सड़क और जलभराव: राजेंद्र नगर, कदमकुआं, सिपारा और कई इलाकों में सड़कें बनी हैं, लेकिन जलनिकासी और ट्रैफिक अब भी बड़ी समस्या है।
- राशन और सरकारी योजनाएं: कई लोगों ने राशन कार्ड से नाम हटने और योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की शिकायत की।
- कानून व्यवस्था और नशाखोरी: महिलाओं और स्थानीय लोगों ने कुछ इलाकों में नशेड़ियों की बढ़ती गतिविधियों और पुलिस गश्त बढ़ाने की मांग की।
- स्थानीय बनाम बाहरी नेता: भाजपा समर्थक स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि बदलाव चाहने वाले मतदाता नए चेहरे को मौका देने की बात कर रहे हैं।
क्या है बांकीपुर का जातीय समीकरण?
कायस्थ: कायस्थ समाज के लोग यहां करीब 15 फीसदी हैं। यह वोट बैंक वर्षों से भाजपा का मजबूत आधार रहा है। उम्मीदवार चयन में इस वर्ग का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।
भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत: सवर्ण वोट भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं। बांकीपुर में भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत आबादी 20 से 22% है। हालांकि इस बार छात्र आंदोलन और बदलाव की राजनीति के कारण इनके एक हिस्से में प्रशांत किशोर की पैठ बढ़ी है।
वैश्य: व्यापारी वर्ग का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से भाजपा के साथ माना जाता है। बांकीपुर में इनकी आबादी करीब 12% है।
यादव: बाकीपुर में यादव वोटर की संख्या करीब 10-12 फीसदी है। इन्हें राजद का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। यदि यादव वोट पूरी तरह एकजुट रहता है तो राजद मुकाबले में प्रभाव बनाए रख सकती है।
कुर्मी-कोइरी: बांकीपुर में कुर्मी और कोइरी समाज के लोगों की संख्या करीब 10-12 फीसदी है। इस वर्ग का साथ जदयू को मिलता है। JDU NDA गठबंधन में है। इसलिए इनका साथ भाजपा उम्मीदवार को मिल सकता है। अनुसूचित जाति: बांकीपुर में अनुसूचित जाति के वोटर की संख्या करीब 8 फीसदी है।
मुस्लिम: मुस्लिम समाज के वोटर की संख्या 7-8% है। इस वर्ग द्वारा भाजपा विरोधी मतदान की संभावना अधिक रहती है। इस बार जन सुराज और राजद के बीच इनका वोट बंटवारा चुनाव को प्रभावित कर सकता है।
नितिन नवीन ने बांकीपुर में कौन से काम कराए?
- अशोक राजपथ डबल डेकर एलिवेटेड रोड परियोजना को जमीन पर उतारने में सक्रिय भूमिका रही।
- जेपी गंगा पथ (मरीन ड्राइव) का निर्माण करवाया। इससे बांकीपुर क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी मिली।
- मीठापुर-सिपारा-महुली एलिवेटेड रोड परियोजना से दक्षिण पटना का ट्रैफिक कम करने में मदद मिली।
- सिपारा, राजेंद्र नगर, कदमकुआं, बुद्धा कॉलोनी और अन्य वार्डों में सड़कों का निर्माण एवं चौड़ीकरण कराया।
- कई इलाकों में नालियों का निर्माण और ड्रेनेज सुधार कराए।
- फ्लाईओवर, सड़क चौड़ीकरण और प्रमुख चौराहों का विकास कराया।
- बांकीपुर में फुटओवर ब्रिज, वेंडर जोन, सार्वजनिक सुविधाओं और शहरी सौंदर्यीकरण के कई काम हुए।
- बिजली, पेयजल और नगर निगम से जुड़े विकास कार्यों की नियमित समीक्षा की गई।
क्या कहते हैं, भाजपा, जन सुराज और राजद के नेता
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा, ‘जनता को प्रधानमंत्री द्वारा किए गए विकास कार्यों पर पूरा भरोसा है। मुझे यकीन है कि नीरज सिन्हा लोगों का भरोसा जीतेंगे। बांकीपुर में हमने विकास की जो गति बनाई है उसे नीरज सिन्हा के नेतृत्व में आगे बढ़ाएंगे।
जन सुराज के राष्ट्रीय प्रवक्ता कुमार सौरव सिंह ने कहा कि हमारी कोशिश बिहार में नया विकल्प और नई राजनीति देने की है। जनता के मुद्दों पर बोलने वाले प्रशांत किशोर को लोग विधानसभा भेजेंगे।







