लोकतंत्र में उपचुनावों को अक्सर केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया मान लिया जाता है, लेकिन कई बार यही छोटे चुनाव बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आते हैं। बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीटों के उपचुनावों ने भी यही साबित किया है। तीनों ही सीटों के नतीजों […]
By UB India News • Patna, Bihar बुधवार, 5 अगस्त 2026, 01:52 AM • 6 मिनट read
लोकतंत्र में उपचुनावों को अक्सर केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया मान लिया जाता है, लेकिन कई बार यही छोटे चुनाव बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आते हैं। बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीटों के उपचुनावों ने भी यही साबित किया है। तीनों ही सीटों के नतीजों ने राजनीतिक दलों के संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवारों के चयन और जनभावनाओं को समझने के संबंध में अहम संकेत दिए हैं।
सर्वाधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही, जहां भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त करते हुए प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी पहली बार विधानसभा तक पहुंच गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष नितिन नवीन के गढ़ में प्रशांत किशोर की यह जीत कितनी प्रभावशाली रही, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि मतों की गिनती के पहले से लेकर अंतिम चरण तक एक बार भी भाजपा प्रत्याशी उनसे आगे नहीं बढ़ सका।
बांकीपुर की जीत दरअसल उस राजनीतिक प्रयोग की पहली ठोस सफलता है, जिसे प्रशांत किशोर पिछले कुछ वर्षों से बिहार में खड़ा करने कोशिश कर रहे थे। यही जन सुराज पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में 238 में से 236 सीटों पर अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी थी। लिहाजा, इस जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को मिलना ही चाहिए, पर इसके लिए भाजपा की अपनी रणनीतिक भूलें कोई कम जिम्मेदार नहीं। पहले अभिषेक कुमार बंटी को उम्मीदवार बनाना, फिर उनसे नामांकन वापस कराते हुए आनन-फानन में एक अनजान चेहरे को मैदान में उतारे जाने से कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक ही भ्रम की स्थिति पैदा हुई, जिससे मतदाताओं में पार्टी की छवि पर भी यकीनन असर पड़ा होगा।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने ई-20 और खासकर पटना में नीट परीक्षा आंदोलन जैसे मुद्दों से उपजी नाराजगी को प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में मोड़ लिया। गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा ने राज्य में अपनी मजबूत स्थिति जरूर साबित की है, लेकिन मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली हार एक बार फिर भाजपा के भीतर पनप रही असंतुष्टि को दर्शाती है।
पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के निर्णय ने पार्टी के एक बड़े वर्ग को असहज किया, जिससे पूरे चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कथित भितरघात की चर्चाएं लगातार होती रहीं। यह संदेश भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है कि कार्यकर्ताओं का आंतरिक असंतोष और भितरघात जैसी प्रवृत्तियां चुनावी मैदान में घातक साबित हो सकती हैं। प्रशांत किशोर के लिए यह जीत उत्साहजनक है, पर इस जीत का श्रेय जितना उनको है, उतना ही भाजपा की रणनीतिक भूलों को भी है। भाजपा के लिए ये नतीजे आत्ममंथन का अवसर जरूर हैं।
क्या NDA-RJD के लिए संदेश?
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने राज्य में नई राजनीति और नए विकल्प की खिड़की खोल दी है। इस नतीजे ने जहां सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी बजाई है, वहीं मुख्यधारा के दलों को युवाओं की आकांक्षाओं को लेकर सचेत होने का संदेश भी दिया है। नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में न सिर्फ राजग का अगड़ा-अति पिछड़ा बल्कि राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण भी औंधे मुंह गिरा है। यहां तक कि भाजपा उम्मीदवार अपने बूथ पर भी पीछे रहा।
इस नतीजे के कई गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। महज एक वर्ष पूर्व जिस जनसुराज पार्टी के 238 में से 236 उम्मीदवारों ने जमानत गंवा दी थी, उसी पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में पटखनी दी है। भाजपा उम्मीदवार का आधार स्वजातीय कायस्थ और दूसरे अगड़े वर्ग के कुछ हिस्से तक ही सीमित रह गया। वहीं राजद के वोट बैंक में आई 30 हजार वोटों की कमी बताता है कि उसके मूल यादव-मुस्लिम मतदाता (22 फीसदी) ने इस बार उससे दूरी बरत ली। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे ने बीते दो दशक से भी अधिक समय से चली आ रही राजग बनाम राजद केंद्रित राजनीति के लिए भी खतरे की घंटी बजाई है।
उपचुनावों ने कई बार बड़े बदलावों में भूमिका निभाई
1993 में वैशाली सीट पर जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह के निधन के बाद हुआ उपचुनाव बिहार की राजनीति का बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। इसमें बिहार पीपुल्स पार्टी की लवली आनंद ने सत्ताधारी जनता दल की किशोरी सिन्हा को पटखनी दी। जीत से उत्सािहत आनंद मोहन ने 1995 के विधानसभा चुनाव में 259 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए। इससे सत्ता विरोधी वोट बंटे, जिसका सीधा लाभ लालू प्रसाद और जनता दल को मिला और उनकी सत्ता में वापस आसान हो गई।
इलाहाबाद (1988) : वीपी सिंह का उदय
1988 का इलाहाबाद लोकसभा उपचुनाव ऐतिहासिक है। वीपी सिंह ने कांग्रेस के सुनील शास्त्री को भारी अंतर से हराया। इस हार ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया और 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने।
चिकमगलूर (1978) : इंदिरा की वापसी
आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव हार चुकीं पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 1978 के चिकमगलूर उपचुनाव में जीत दर्ज कर अपनी खोई साख को फिर से कायम किया और 1980 के आम चुनाव में प्रचंड बहुमत से जीत कर दोबारा प्रधानमंत्री बनीं।
चिकमंगलूर हो या इलाहाबाद, अब उसी कड़ी में बांकीपुर का यह उपचुनाव परिणाम भी देखा जा रहा है। भाजपा के लिए यह हार सिर्फ एक सीट गंवाने तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और पारंपरिक वोट बैंक में संभावित सेंध का संकेत भी है।
जनादेश स्वीकार…पार्टी करेगी मंथन : नितिन नवीन
बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि भाजपा जनादेश का सम्मान करती है और बांकीपुर तथा दतिया के नतीजों पर गंभीरता से आत्ममंथन करेगी। नवीन ने कहा कि पार्टी नई ऊर्जा और संकल्प के साथ जनता के बीच जाएगी और उसका भरोसा और मजबूत करने का प्रयास करेगी। वहीं गुजरात की मांजलपुर सीट पर मिली जीत के लिए उन्होंने मतदाताओं व कार्यकर्ताओं का आभार जताया।
प्रशांत किशोर की जीत पर राजद सांसद मीसा भारती ने कहा कि यह पार्टी के लिए चिंता की बात है और नेतृत्व को हार पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वहीं, रोहिणी आचार्य ने अपने भाई और राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा, जीत उसी की होती है जो लगातार लड़ता है, जनता से जुड़ा रहता है।