बिहार से बने BJP के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी टीम की घोषणा की। 65 सदस्य वाली राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम में बिहार के सिर्फ 3 नेता को जगह दी गई है।
बिहार से राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते संभावना जताई जा रही थी कि बीजेपी हेडक्वार्टर में इस बार बिहार की मौजूदगी मजबूत होगी। कई नेता इसके काबिल भी बताए जा रहे थे। मंगल पांडे को सरकार के बाद अब संगठन में भी जगह नहीं मिली है।
हमने बीजेपी के प्रदेश स्तर पर कुछ बड़े नेताओं से बात की और उनसे समझा कि आखिर मंगल पांडे राष्ट्रीय टीम से दूर क्यों हुए? गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद माने जाने वाले संजय मयूख साइडलाइन क्यों किए गए? अब तक प्रदेश संगठन में काम कर रहे शिवेश राम और सिद्धार्थ शंभु को दिल्ली भेजने के पीछे किनका हाथ है।
सबसे पहले बदलाव को समझिए
पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की टीम में मीडिया सह संयोजक जैसे अहम पद पर रहे संजय मयूख की नितिन नवीन की टीम से छुट्टी कर दी गई है। राष्ट्रीय मंत्री रहे ऋतुराज सिन्हा को पार्टी के सभी सेल के सह संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, बिहार में पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे सिद्धार्थ शंभू को राष्ट्रीय मंत्री और एससी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे राज्यसभा सांसद शिवेश राम को अब यही जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्तर पर दी गई है।
क्या डस्टबिन विवाद के चलते किनारे हुए मंगल पांडे
बंगाल में भाजपा के प्रचंड जीत के बाद ऐसा माना जा रहा था कि इसका सेहरा राज्य के प्रभारी मंगल पांडे के सिर सजेगा। लेकिन अब चुनाव बाद मंगल पांडे का कद लगातार छोटा किया जा रहा है।
- सबसे पहले उन्हें बिहार में बनी पहली बीजेपी सरकार से बाहर किया गया। सीनियर लीडर होने के बाद भी सम्राट सरकार में जगह नहीं दी गई।
- उस वक्त पार्टी नेताओं की तरफ से कहा गया कि मंगल पांडे केंद्र की राजनीति में जायेंगे। राष्ट्रीय टीम में बड़ा पद मिलेगा।
- अब यहां भी मंगल के हाथ निराशा लगी। वर्तमान में वह पार्टी के एक विधायक बनकर रह गए हैं।
- बीजेपी में उपाध्यक्ष स्तर के एक नेता ने भास्कर को बताया, ‘मंगल पांडे की एक के बाद एक कई कंट्रोवर्सी सामने आ रही है। मीडिया में आने से पहले इसकी जानकारी केंद्रीय नेतृत्व को मिल गई है।’
- ‘चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने भी मंगल पांडे पर करप्शन के गंभीर आरोप लगाए थे। इन सबके कारण पार्टी फिलहाल उनसे दूरी बना रही है। हालांकि एक चर्चा इस बात की भी है कि यूपी चुनाव में एक बार फिर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है।’
क्या है डस्टबिन मामला?
मंगल पांडे के स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे गई डस्टबिन की कीमत पर सवाल उठे हैं। विपक्ष का आरोप है कि करीब 1000-1500 रुपए में मिलने वाले 75 लीटर के डस्टबिन को 15,490 रुपए में खरीदा गया।
इसी तरह 45 लीटर के डस्टबिन की कीमत भी बाजार दर से काफी ज्यादा बताई गई है। हालांकि सरकार की ओर से इसे मेडिकल वेस्ट के लिए विशेष कंटेनर बताया गया है।
300 करोड़ रुपए से ज्यादा की खरीद पर सवाल
आरोप सिर्फ डस्टबिन तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य विभाग में हुई करीब 300 करोड़ रुपए से ज्यादा की खरीद में अनियमितता का दावा किया जा रहा है। विपक्ष मंगल पांडे के स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए हुई खरीद की प्रक्रिया, टेंडर, कंपनियों के चयन और कीमत तय करने के तरीके पर सवाल उठा रहा है।
तेजस्वी यादव ने मामले की जांच की मांग की है। कहा है कि पता चलना चाहिए कि सरकारी पैसे से हुई इतनी बड़ी खरीद में सामान की कीमत किसने तय की, खरीद का फैसला किस स्तर पर हुआ और किस कंपनी से सामान खरीदा गया। अगर बाजार में सामान कम कीमत पर उपलब्ध था तो सरकार ने इतनी ज्यादा कीमत क्यों चुकाई। वहीं, प्रशांत किशोर ने सीधे आरोप नहीं लगाया। उन्होंने दस्तावेज देखने की बात कही है।
कास्ट या क्लैश के कारण OUT हुए संजय मयूख
दिल्ली दरबार में संजय मयूख की मजबूत पकड़ मानी जाती है। उन्हें सीधे अमित शाह की टीम का मेंबर माना जाता है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार मीडिया सह प्रभारी रहते हुए नेशनल मीडिया के साथ कोआर्डिनेशन करते आ रहे थे। मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी के भी करीबी माने जाते हैं। बलूनी अपने पद पर बने रहे, लेकिन मयूख नहीं। वे अब सिर्फ विधान परिषद के सदस्य हैं। मयूख की छुट्टी को लेकर दो तरह की चर्चाएं हैं-
- पहला- संजय मयूख कायस्थ कम्युनिटी से आते हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी इसी जाति से हैं। इनके अलावा ऋतुराज सिन्हा भी कायस्थ हैं। ऐसे में जातीय समीकरण के लिहाज से मयूख फिट नहीं बैठ रहे थे। इसके चलते उनकी छुट्टी कर दी गई।
- दूसरा- बीजेपी सूत्रों की माने तो नितिन नवीन और संजय मयूख के संबंध बहुत अच्छे नहीं माने जाते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। बांकीपुर में बीजेपी की हार को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है। मयूख समेत इस इलाके के कई बड़े कायस्थ नेताओं ने खुलकर कैंडिडेट का साथ नहीं दिया। मयूख की संगठन से विदाई को इससे भी जोड़ कर देखा जा रहा है।
अपनी लॉबी के मेंबर को राष्ट्रीय टीम में पहुंचाने में सफल रहे दो नेता
अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए शिवेश राम को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का करीबी माना जाता है।
प्रदेश स्तर के एक नेता ने भास्कर को बताया कि शिवेश राम को विधायक का चुनाव लड़ाने से लेकर उन्हें राज्यसभा तक पहुंचाने में भी राय की अहम भूमिका रही है। अब संगठन में दायित्व मिलने में भी नित्यानंद राय के रिकमेंडेशन को ही माना जा रहा है।
RSS बैकग्राउंड से आने वाले सिद्धार्थ शंभु को संगठन का सिपाही माना जाता है। वे प्रदेश में मंत्री से उपाध्यक्ष रह चुके हैं। मोतिहारी के रहने वाले शंभू को पूर्व प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल का करीबी माना जाता है। दोनों कलवार कम्युनिटी से आते हैं। संजय सरावगी ने प्रदेश में अपनी टीम से सिद्धार्थ शंभू को आउट कर दिया था।
क्या भाजपा ‘कोर वोटर’ की जगह सोशल इंजीनियरिंग पर जा रही है?
भाजपा ने एक तरफ अपने पुराने चेहरों की भूमिका बदली है, दूसरी तरफ नए सामाजिक समूहों और नए नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर आगे किया है। जैसे..
- शिवेश राम- दलित प्रतिनिधित्व
- सिद्धार्थ शंभू- नया और वैश्य चेहरा
- ऋतुराज सिन्हा- कायस्थ प्रतिनिधित्व, लेकिन बदली हुई भूमिका
ऐसे में सवाल है कि क्या भाजपा बिहार में अपनी पारंपरिक सवर्ण-केंद्रित छवि से आगे बढ़कर अधिक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहती है?
राजनीतिक मामलों के जानकार रवि उपाध्याय के अनुसार भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत भाजपा के लंबे समय से महत्वपूर्ण समर्थक वर्ग रहे हैं। यदि इन समुदायों में प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष पैदा होता है तो पार्टी के लिए यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विषय हो सकता है।







