इस साल दिसंबर में समाप्त हो रही भारत-बांग्लादेश फरक्का जल संधि के नवीकरण से पहले बिहार की राजनीति गरमा गई है। इस मुद्दे पर सत्ताधारी जदयू और मुख्य विपक्षी पार्टी राजद खूब टकराया। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुआ। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने इस संधि के मामले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद को घेरा। कहा- दिसंबर 1996 में जब यह संधि हुई थी, तब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। केंद्र में उनकी पार्टी समर्थित सरकार थी। उस समय बिहार के हितों की अनदेखी की गई।
मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने शुरू से इस संधि का विरोध किया। वहीं, जदयू के राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि फरक्का संधि लालू प्रसाद की नाकामी है। इधर, राजद सांसद सुधाकर सिंह ने जदयू नेताओं को जवाब दिया। कहा कि जदयू नेता संजय झा सहति अन्य फरक्का संधि पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। लालू और जगदानंद ने हमेशा आवाज उठाई है।
जेल के डर से लालू ने विरोध नहीं किया : जदयू
जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि जब महागठबंधन की सरकार थी, तब उन्हें बिहार की हकमारी क्यों नहीं दिखी? दरअसल, तब चारा घोटाले के चलते जेल जाने के डर से लालू प्रसाद ने इस संधि का विरोध नहीं किया था। राजद सांसद सुधाकर सिंह को यह याद रखना चाहिए कि उनके पिता जगदानंद 15 वर्षों तक जल संसाधन मंत्री रहे, लेकिन उन्होंने विभाग को बर्बाद करने का काम किया। हम दिसंबर 2026 में खत्म हो रही इस संधि के नवीकरण के विरुद्ध पूरी ताकत से आवाज उठाएंगे।
बिहार को हिस्सेदार बनाया जाए : सुधाकर
राजद सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि जदयू के नेता फरक्का जल संधि मामले में लोगों को गुमराह कर रहे हैं। लालू प्रसाद ने वर्षों पहले इस संधि के दुष्परिणामों को लेकर चेतावनी दी थी। बिहार लैंड लॉक्ड राज्य है। गंगा ही इसके व्यापारिक व नौपरिवहन की जीवनरेखा है। 1996 की संधि के दौरान बिहार से बिना सहमति लिये यह समझौता थोपा गया। इससे आज राज्य को गाद की समस्या, घटते जल प्रवाह और बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। इसको लेकर आगामी समीक्षा बैठक में बिहार को हिस्सेदार बनाया जाए। बिहार के हितों की रक्षा हो।
बिहार के किसानों का भविष्य दांव पर
फरक्का बराज व गंगा जल संधि का यह विवाद अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बिहार के आगामी राजनीतिक भविष्य का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। जदयू दिसंबर 2026 में संधि के नवीकरण का विरोध कर इसे बिहार के हित में जदयू की दूरदर्शिता बता रहा, तो राजद इसे 1996 के फैसलों से जोड़कर मौजूदा एनडीए सरकार पर राजनीतिक लीपापोती करने का आरोप लगा रहा। इस खींचतान के केंद्र में बिहार के किसानों, जल प्रबंधन और आर्थिक संप्रभुता का भविष्य दांव पर लगा है।
फरक्का जल संधि 1996 कैसे है बिहार के लिए नुकसानदेह?
यह जल संधि गंगा नदी के पुराने प्रवाह के आंकड़े (1949-1988) पर आधारित है। आठ साल पुराने आंकड़ों के आधार पर 1996 में समझौता किया गया। इस बीच ग्लोबल वार्मिंग और वनों की लगातार कटाई के कारण गंगा नदी के पानी का वास्तविक प्रवाह बहुत कम हो गया है। पिछले बीस- पच्चीस सालों में पर्यावरण असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है। शुष्क मौसम (जनवरी से मई) के दौरान गंगा नदी में बहुत कम पानी रहता है। जब बिहार में गंगा नदी में पानी बहुत कम रहेगा तो फिर भारत, बांग्लादेश को पानी देने की गारंटी को कैसे पूरा करेगा। यहीं से बिहार की हकमारी शुरू हो जाती है।
हकमारी है बिहार की सहायक नदियों के पानी का दोहन
गंगा नदी बक्सर के पास बिहार में प्रवेश करती है। शुष्क मौसम (जनवरी से मई) के दौरान बक्सर में गंगा नदी में करीब 400 क्यूसेक पानी रहता है। बांग्लादेश को करीब 53 हजार क्यूसेक (1500 क्यूमेक) पानी की जरूरत रहती है। तब इस जरूरत को पूरा करने के लिए बिहार की सहायक नदियों जैसे सोन, गंडक, कोसी, घाघरा, महानंदा के पानी को गंगा में मोड़ कर फरक्का की तरह प्रवाहित कर दिया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक फरक्का पहुंचने वाले कुल पानी का करीब 70 फीसदी भाग अकेले बिहार की इन सहायक नदियों का होता है।
बैकवाटर इफेक्ट से बाढ़ की समस्या
गंगा नदी प्रवाह के साथ जो मिट्टी और बालू लाती है व फरक्का बांध के कारण बिहार में गाद के रूप में जमा हो जाता है। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। गाद जमा होने के कारण गंगा नदी बिहार में उथली हो गयी है, यानी उसका तल ऊपर उठ गया है। नदी की गहराई कम हो गयी है और कहीं कहीं बालू और मिट्टी के टीले उभर आये हैं। इससे नदी का स्वाभाविक प्रवाह बाधित हो गयी है। बरसात में जब फरक्का बैराज के गेट (109 गेट) जब बंद रहते हैं तो पानी पीछे की तरफ धक्का मारता है। इसे बैकवाटर इफेक्ट कहते हैं। इससे बिहार तटवर्ती जिलों में बाढ़ की समस्या बनी रहती है।







