बिहार की सियासी गलियारे में नीतीश विरासत की जंग इन दिनों खास चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सवाल तो इस सिलसिले में कई खड़े किए जा रहे हैं, मगर जो सवाल राजनीतिक गलियारों में खास तव्वजो पा रहा है, वो ये कि क्या मोदी-शाह का कहीं गेम प्लान तो नहीं नीतीश विरासत की जंग! ये इसलिए कि नीतीश की विरासत की जंग की शुरुआत राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा से ही शुरू कर दी। चलिए जानते हैं कि विरासत की जंग बहस के केंद्र में क्यों मोदी और अमित शाह की जोड़ी चर्चा में है।
उपेंद्र कुशवाहा की हर बात में मोदी शाह की ‘हां’
बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के काफी करीबी उपेंद्र कुशवाहा कुछ खास मौके पर प्रिविलेज पाते रहे हैं। जब राजनीतिक गलियारों में उनके संभावनाओं को ना कहा जाता रहा हो, वो सफल होते दिखे। वो चाहे लोकसभा 2024 हो या बिहार विधानसभा चुनाव 2025। राष्ट्रीय लोक मोर्चा को अपेक्षानुकूल अनुमान से ज्यादा हिस्सेदारी मिलती रही है। इसे लेकर अन्य साथी दलों के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी काफी कानाफूसी हुई। कई को टिकट से बेदखल होना पड़ा। मगर, ये सब होता रहा और उपेंद्र कुशवाहा को जो कुछ पाना था पाते रहे।
तहलका तो तब मचा
लेकिन, तहलका तो तब मचा जब विधानसभा में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलने के बावजूद उपेंद्र कुशवाहा अपने पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने में सफल रहे। वो भी तब, जब दीपक प्रकाश किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। आलोचना के दायरे में तब बीजेपी नेतृत्व तो आया ही उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी के भीतर भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लगा की पार्टी टूट जाएगी। हुआ वही जो बीजेपी नेतृत्व चाहता था, दीपक प्रकाश मंत्री बने रहे।
उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा भी गए
उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश जब मंत्री बने रहे तो राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा विशेष होने लगी कि उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा नहीं जाने के शर्त पर आपने पुत्र को मंत्री बनाया होगा। लेकिन जब बिहार कोटे से पांच रिक्त हुए राज्यसभा सीटों पर उम्मीदवार भेजनी की बात हुई, तब उम्मीदवार के तौर पर राजनीतिक गलियारों में उपेंद्र कुशवाहा की चर्चा न के बराबर ही होती रही। लेकिन, जब राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम की घोषणा हुई तो उपेंद्र कुशवाहा को चौथे उम्मीदवार की जगह स्थापित थे। बीजेपी ने मेहरबानी की हद ये दिखा दी कि पांचवें उम्मीदवार के रूप में बीजेपी ने अपने उम्मीदवार शिवेश राम की लड़ाई को जोखिम डाल दिया।
फिर मंत्री बने दीपक प्रकाश!
बिहार जब ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा था और विकास पुरुष नीतीश कुमार को बतौर मुख्यमंत्री पद से मुक्त कराया जा रहा था, तब नए मंत्रिमंडल में दीपक प्रकाश के मंत्री बनने की संभावना लगभग नहीं थी। तब न्यायालय की टिप्पणी भी प्रतिकूल थी। बावजूद दीपक प्रकाश मंत्री बनाए गए। अंततः दीपक प्रकाश के मंत्री पद को जस्टिफाई करने के लिए अपने एमएलसी देवेश कुमार की कुर्बानी देकर उनके मंत्री पद को बचाया गया।
विरासत की जंग में भाजपा क्यों?
सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर मोदी और शाह की जोड़ी विरासत की जंग में अपना हाथ क्यों होम करेंगे? भाजपा के भीतर खाने की माने तो बीजेपी अब नहीं चाहती है कि अब कोई नीतीश कुमार की तरह कद्दावर नेता हो, जो बीजेपी की मजबूरी बन जाए। इस वजह से पावर बैलेंस के गेम में विरासत की जंग शुरू हुई है। ये काम उपेंद्र कुशवाहा से बेहतर कौन कर सकता है? कुशवाहा की राजनीति का अखंड पाठ सम्राट चौधरी के भरोसे ही क्यों? इसलिए भी ये जंग कि नीतीश कुमार की विरासत का हकदार कौन? सम्राट चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा या कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत!







